विधानसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद जहां राजद लगातार भीतरघात और टूट की चुनौतियों का सामना कर रही है, वहीं पार्टी को अब एक और गहरा झटका लगा है। कभी बाढ़ लोकसभा सीट से नीतीश कुमार को हराकर सुर्खियों में आए वरिष्ठ समाजवादी नेता, पूर्व सांसद और राज्य सरकार में मंत्री रह चुके विजय कृष्ण (Vijay Krishna RJD Exit) ने राष्ट्रीय जनता दल से नाता तोड़ लिया है। उन्होंने सीधे पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को पत्र लिखकर न सिर्फ राजद की प्राथमिक सदस्यता बल्कि सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया है, साथ ही सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा भी कर दी है।
लालू यादव को भेजे गए इस भावुक पत्र ने बिहार की राजनीति में नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विजय कृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि उन्होंने दलगत राजनीति से स्वयं को अलग करने का कठिन लेकिन अंतिम निर्णय ले लिया है। उनकी इस घोषणा ने राजद के भीतर उस असंतोष और अंतर्विरोध को भी उजागर कर दिया है, जिसकी चर्चा पिछले कई महीनों से हो रही थी। चुनावी हार के बाद जहां पार्टी संगठन को पुनर्गठित करने की कवायद जारी है, वहीं विजय कृष्ण जैसे अनुभवी नेता का जाना राजद के लिए बड़ा नुकसान माना जा रहा है।
बिहार में समाजवादी राजनीति की धारा में लंबे समय तक सक्रिय रहे विजय कृष्ण का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बाढ़ सीट से एक ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी, जब उन्होंने तत्कालीन रेलमंत्री और बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक नीतीश कुमार को लगभग 37 हजार मतों से पराजित किया था। इस जीत ने न केवल उनकी राजनीतिक हैसियत बढ़ाई थी, बल्कि उन्हें लालू यादव के सबसे भरोसेमंद नेताओं की कतार में भी खड़ा कर दिया था।
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विजय कृष्ण का राजनीतिक मार्ग हमेशा से नीतीश कुमार और लालू यादव की दो ध्रुवीय राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता रहा। 90 के दशक में वे नीतीश के करीबी सहयोगी थे, लेकिन समता पार्टी बनने के बाद दोनों नेताओं के रास्ते अलग हो गए। इसके बाद उन्होंने बाढ़ क्षेत्र को अपनी मुख्य राजनीतिक भूमि बनाया और लगातार कई चुनाव नीतीश कुमार के खिलाफ लड़े, हालांकि शुरुआती तीन चुनावों (1996, 1998, 1999) में उन्हें निराशा हाथ लगी। लेकिन 2004 की उनकी जीत ने राज्य की राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया था।
उनका राजनीतिक सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा। 2009 में जदयू नेता सत्येंद्र सिंह की हत्या के मामले में उनके बेटे के साथ मुकदमा चला और निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी, हालांकि 2022 में पटना हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया। इसी दौरान वे कई बार राजनीतिक दल बदलते रहे। 2009 में राजद छोड़कर जदयू गए, फिर 2010 में नीतीश सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए वापस राजद में लौट आए।






















