बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे गया जिले की बोधगया सीट (Bodhgaya Election 2025) पर सियासी हलचल तेज हो गई है। अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित यह सीट न केवल दलित राजनीति का केंद्र मानी जाती है, बल्कि पूरे मगध क्षेत्र की चुनावी दिशा तय करने में भी बड़ी भूमिका निभाती है। इस सीट पर अब तक कांग्रेस, वाम दल, आरजेडी, बीजेपी और लोजपा जैसे दलों ने बारी-बारी से कब्जा जमाया है, जो इसे बिहार की सबसे दिलचस्प विधानसभा सीटों में से एक बनाता है।
राजनीतिक इतिहास
बोधगया की राजनीतिक यात्रा बिहार की सत्ता के उतार-चढ़ाव की झलक दिखाती है। 70 और 80 के दशक में वाम दलों का प्रभाव यहां गहराई तक था। सीपीआई ने तीन बार इस सीट पर जीत दर्ज की। इसके बाद 90 के दशक में आरजेडी के उदय के साथ यह सीट लालू प्रसाद यादव के प्रभाव वाले सामाजिक समीकरण की तरफ झुक गई। पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने 2000 में आरजेडी के टिकट पर जीत हासिल कर इस सीट को राष्ट्रीय पहचान दी।
बाराचट्टी विधानसभा 2025: ज्योति मांझी की राजनीति और RJD के खिलाफ चुनौती
2005 में जब बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार और भाजपा का गठबंधन उभरा, तब हरि मांझी ने पहली बार बीजेपी को यहां जीत दिलाई। हालांकि, यह समीकरण ज्यादा समय तक नहीं टिक सका। 2009 के उपचुनाव में लोजपा के कुमार सर्वजीत विजेता बने और 2015 में उन्होंने आरजेडी के टिकट पर वापसी करते हुए जीत हासिल की। 2020 के विधानसभा चुनाव में भी सर्वजीत ने 80,196 वोट पाकर बीजेपी प्रत्याशी हरि मांझी को हराया था, जिन्हें 75,921 वोट मिले थे।
जातिगत समीकरण
आगामी चुनाव में बोधगया का समीकरण और भी दिलचस्प होगा। एक ओर बीजेपी और जेडीयू गठबंधन अपनी जातीय गणित पर भरोसा जता रहा है, वहीं आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन पिछड़े और दलित वर्ग के साथ मुस्लिम वोटरों को जोड़ने की कोशिश में है। इस बार लोजपा (रामविलास) की सक्रियता भी मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती है। अनुसूचित जाति की आबादी करीब 35.72% है, जबकि मुस्लिम मतदाता लगभग 7.03% हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सवर्ण समुदायों के मतदाता शेष वोटों में बंटे हैं। दिलचस्प बात यह है कि 92% वोटर ग्रामीण इलाकों से हैं, जिससे स्थानीय मुद्दे और विकास की राजनीति निर्णायक साबित हो सकती है।






















