Chirag Paswan: बिहार की राजनीति में चिराग पासवान ने एक ऐसा सधा हुआ दांव चला है, जो सिर्फ सियासी बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे ज़मीन से जुड़ा हुआ नजर आता है। ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ का नारा लंबे समय से चर्चा में था, लेकिन अब पहली बार यह नारा नीतियों और फैसलों के रूप में सामने आता दिख रहा है। गन्ना किसानों की आमदनी बढ़ाने से लेकर बंद पड़ी चीनी मिलों को दोबारा शुरू करने और उद्योग-रोजगार का पूरा इकोसिस्टम खड़ा करने की दिशा में जो संकेत मिले हैं, उसने बिहार की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।
नीतीश सरकार की पहली कैबिनेट बैठक के बाद गन्ने के समर्थन मूल्य में 15 से 20 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ोतरी का फैसला सामने आया। औपचारिक रूप से यह घोषणा सरकार की है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर लगभग सहमति है कि इसके पीछे सबसे मजबूत दबाव और रणनीति चिराग पासवान की रही है। वजह साफ है- गन्ना उद्योग मंत्रालय लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के पास है और चिराग पासवान ने शुरू से ही साफ कर दिया था कि अगर वादे किए गए हैं, तो उन पर काम भी दिखना चाहिए।
बिहार में गन्ना खेती एक समय में किसानों की कमाई का बड़ा जरिया हुआ करती थी, लेकिन चीनी मिलों के बंद होने, भुगतान में देरी और बाजार की अनिश्चितता ने किसानों को धीरे-धीरे इस फसल से दूर कर दिया। गन्ना, जो एक कैश क्रॉप है, घाटे का सौदा बन गया और किसान दूसरी फसलों की तरफ मुड़ने लगे। इसका असर सिर्फ किसानों पर नहीं पड़ा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार पर भी पड़ा। चिराग पासवान ने इसी कमजोर कड़ी को अपनी राजनीति का आधार बनाया है।
गन्ना उद्योग मंत्रालय के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि अब फैसले सिर्फ फाइलों में नहीं रुकेंगे। 34 बंद पड़ी चीनी मिलों को दोबारा खोलने की घोषणा और नई चीनी मिलें लगाने की बात सीधे तौर पर यह संकेत देती है कि सरकार अब गन्ना आधारित अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करना चाहती है। नीतीश सरकार ने यहां तक कह दिया है कि अगर किसी स्तर पर आर्थिक मदद की जरूरत पड़ेगी, तो राज्य सरकार पीछे नहीं हटेगी।
गन्ने के नए समर्थन मूल्य पर नजर डालें, तो बेहतरीन क्वालिटी के गन्ने का दाम 365 रुपये से बढ़ाकर 380 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है। औसत और सामान्य श्रेणी में भी 15 से 20 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है। देखने में यह बढ़ोतरी छोटी लग सकती है, लेकिन जब किसान कई क्विंटल गन्ना बेचते हैं, तो यह अंतर उनके लिए बड़ी राहत बन जाता है। ढुलाई खर्च निकलना, नकदी का भरोसा और फसल के प्रति दोबारा विश्वास- ये तीनों बातें किसानों के फैसले बदल सकती हैं।
राजनीतिक रूप से यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि चिराग पासवान लगातार यह कहते आए हैं कि बिहार को सिर्फ नारों से नहीं, बल्कि उद्योग और रोजगार से बदला जा सकता है। चीनी मिलें सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं रहतीं। इनके साथ इथेनॉल प्लांट, सिरप, चॉकलेट, पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट जैसे दर्जनों छोटे-बड़े उद्योग पनपते हैं। इसका सीधा असर युवाओं के रोजगार और पलायन पर पड़ता है। अगर गांव के आसपास ही काम मिलेगा, तो मुंबई, दिल्ली और पंजाब की तरफ पलायन अपने आप कम होगा।
इस पूरी कवायद के पीछे एक और बड़ा सियासी संकेत छुपा है। चिराग पासवान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गन्ना उद्योग को लेकर जो भरोसा दिलाया था, उसे जमीन पर उतारने की कोशिश अब साफ दिख रही है। “बिहार की चीनी से देश की चाय मीठी होगी”—यह सिर्फ एक लाइन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक विजन है, जिसे चिराग अपने वोट बैंक और छवि दोनों से जोड़ रहे हैं।
नीतीश कुमार का इस फैसले पर खुला समर्थन यह बताता है कि गठबंधन के भीतर चिराग पासवान की सौदेबाजी की ताकत कमजोर नहीं है। गन्ना उद्योग मंत्रालय की अनुशंसा पर सरकार का तेजी से फैसला लेना इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में चिराग पासवान खुद को सिर्फ युवा नेता नहीं, बल्कि नीति तय करने वाले नेता के तौर पर पेश करना चाहते हैं।
अगर यह योजना कागज से निकलकर जमीन पर उतरती है, तो इसका सीधा राजनीतिक फायदा चिराग पासवान को मिल सकता है। किसान, युवा और उद्योग- तीनों वर्गों को साधने वाली यह रणनीति ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ को नारे से आगे ले जाती है। अब असली परीक्षा अमल की है। चीनी मिलें कब खुलती हैं, भुगतान कितना समय पर होता है और रोजगार कितना पैदा होता है- यहीं से चिराग पासवान की सियासत का भविष्य तय होगा।
फिलहाल इतना तय है कि गन्ने के दाम बढ़ाने और चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने का फैसला बिहार की राजनीति में सिर्फ एक आर्थिक कदम नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश बन चुका है।






















