दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में शनिवार को एक मुलाक़ात ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा का माहौल गरमा दिया। कांग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। यह भले ही एक ‘शिष्टाचार भेंट’ कही जा रही हो, लेकिन इसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं—खासकर तब जब बिहार की सियासत एक बार फिर करवट लेने को तैयार दिख रही है। क्योंकि कांग्रेस प्रभारी बनने के बाद कृष्णा कई बार पटना आने के बाद भी लालू से नहीं मिले। लेकिन अभी दिल्ली में यह मुलाकात अचानक हुई।
कृष्णा अल्लावरु राहुल गांधी के बेहद करीबी माने जाते हैं और कांग्रेस में उनकी छवि एक तेज-तर्रार और रणनीतिक सोच वाले नेता की है। बिहार प्रभारी के रूप में उनकी नियुक्ति यह संकेत दे चुकी है कि कांग्रेस अब सहयोगी दलों की परछाई बनने की बजाय स्वतंत्र नेतृत्व की राह पर चलने को आतुर है। यही वजह है कि जब उन्होंने लालू यादव से पहली बार मुलाकात की, तो राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे महज़ बीमारी की चिंता नहीं, बल्कि सियासी संकेतों की बुनियाद मान लिया।
मुलाकात का समय भी काफी अहम है। कुछ दिन पहले ही लालू प्रसाद की तबीयत बिगड़ी थी और उन्हें पटना के पारस हॉस्पिटल से दिल्ली एम्स लाया गया था। उनकी हालत अब स्थिर है और उन्हें सीसीयू से सामान्य वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि लालू यादव की पीठ में घाव और सूजन, साथ ही डायबिटीज और ब्लड प्रेशर की समस्याएं बनी हुई हैं। पर डॉक्टरों के अनुसार, जल्द ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी दी जा सकती है।
इस बीच सवाल यह भी उठ रहा है कि बिहार कांग्रेस प्रभारी अब तक लालू से मिलने क्यों नहीं गए थे, जबकि वे कई बार पटना आ चुके हैं? क्या यह दूरी रणनीतिक थी और अब समय आ गया है कि रिश्तों को फिर से परिभाषित किया जाए?