Hijab to PM: महाराष्ट्र के सोलापुर में आयोजित एक राजनीतिक सभा में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने ऐसा बयान दिया जिसने राष्ट्रीय सियासत में नई बहस छेड़ दी। ओवैसी ने कहा कि जिस तरह भारत का संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है, उसी तरह भविष्य में हिजाब पहनने वाली महिला भी देश की प्रधानमंत्री बन सकती है। उन्होंने पाकिस्तान के संविधान की तुलना करते हुए कहा कि पड़ोसी देश में केवल एक धर्म का व्यक्ति ही प्रधानमंत्री बन सकता है, जबकि भारत का संविधान डॉ. बी.आर. आंबेडकर की सोच पर आधारित है, जो किसी भी भारतीय नागरिक को सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद तक पहुंचने का अधिकार देता है। ओवैसी के अनुसार यह उनका व्यक्तिगत सपना है कि भारत में एक दिन हिजाब पहनने वाली बेटी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, भले ही वह उस समय मौजूद हों या नहीं।
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ओवैसी के इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में तुरंत हलचल पैदा कर दी। आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत का लोकतंत्र और संविधान किसी के पहनावे या भाषा के आधार पर प्रधानमंत्री चुनने की शर्तें निर्धारित नहीं करता। झा के मुताबिक प्रधानमंत्री बनने का फैसला जनता के वोट से होता है और इस मुद्दे को अनावश्यक विवादों में घसीटना समाज में नफरत का माहौल बढ़ाता है, जिसे रोकने की जरूरत है। उनका कहना था कि संविधान को कपड़ों के आधार पर परिभाषित करना गलत संदेश देता है और इस दिशा में बहस करने से देश का ध्यान असल मुद्दों से भटकता है।
दूसरी तरफ भाजपा नेता आरपी सिंह ने भी मामले पर प्रतिक्रिया दी और इसे लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया बताते हुए कहा कि भारत में हर नागरिक को प्रधानमंत्री बनने का पूरा अधिकार है। सिंह के बयान से यह संकेत मिलता है कि राजनीतिक दृष्टि से यह मुद्दा विचारधारा से अधिक संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। हालांकि ओवैसी का बयान राजनीतिक रूप से मुस्लिम महिलाओं की प्रतिनिधित्वकारी भूमिका को रेखांकित करता है, वहीं विपक्ष और सत्ताधारी दल की राय साफ करती है कि भारत में नेतृत्व की कुर्सी कपड़ों से नहीं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से तय होती है।






















