बिहार की राजनीति में एक बार फिर उत्तराधिकार की बहस तेज हो गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य पर उठ रहे सवालों के बीच जनता दल यूनाइटेड के भीतर अब उनके बेटे निशांत कुमार की संभावित भूमिका को लेकर चर्चा अपने चरम पर है। पार्टी के एक बड़े वर्ग का मानना है कि नीतीश कुमार के बाद जेडीयू को एक ऐसे चेहरे की जरूरत है जो संगठन को न केवल एकजुट रख सके बल्कि विरासत का सम्मान भी कर सके। इसी कारण से निशांत का नाम लगातार उभरकर सामने आ रहा है।
जेडीयू से जुड़े सूत्र बताते हैं कि मार्च में दिल्ली में प्रस्तावित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में निशांत की सक्रिय एंट्री पर संकेत मिल सकता है। पार्टी चाहती है कि उन्हें ऐसा दायित्व दिया जाए जो नीतीश की राजनीतिक विरासत से मेल खाता हो और कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान भी करे। चर्चाओं के केंद्र में दो विकल्प हैं। पहला, निशांत को राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाया जाए और दूसरा, उन्हें महासचिव की जिम्मेदारी देकर संगठन की मैकेनिक्स से परिचित कराया जाए, जिसके बाद वे पूरे बिहार का दौरा कर सकें।
जेडीयू के कई नेताओं का मानना है कि निशांत कुमार को लेकर बिहार के युवाओं में रूचि और आकर्षण दोनों दिखाई देते हैं। चुनावों के बाद पटना से लेकर जिले तक कई स्थानों पर उनके समर्थन में पोस्टर, नारे और सोशल मीडिया कैंपेन देखने को मिल चुके हैं, जिनमें उन्हें जेडीयू का भविष्य बताया गया है। हाल के दिनों में वे कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी नजर आए और नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण में सबसे आगे बैठने के बाद चर्चा को और बल मिला।
जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा भी दो बार सार्वजनिक मंच से कह चुके हैं कि कार्यकर्ताओं की इच्छा निशांत को पार्टी में देखने की है, पर अंतिम निर्णय नीतीश कुमार को ही लेना है। दिलचस्प बात यह है कि नीतीश कुमार खुद हमेशा से परिवारवाद के खिलाफ रहे हैं। यही कारण है कि 2025 विधानसभा चुनाव से पहले जब पार्टी नेताओं ने निशांत को नालंदा से उतारने का प्रस्ताव रखा, नीतीश ने इसे साफ ठुकरा दिया।
हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता तर्क देते हैं कि परिस्थितियाँ अब बदल चुकी हैं। उनका कहना है कि जेडीयू को नीतीश के बाद भी स्थिर रखना है तो परिवार का कोई भरोसेमंद चेहरा मजबूरी बन सकता है। पहले यही जिम्मेदारी आरसीपी सिंह को दी गई थी लेकिन हालात कुछ और हो गए। इस पृष्ठभूमि में निशांत सबसे सहज विकल्प नज़र आते हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि नीतीश कुमार अपने मौजूदा कार्यकाल में ही उत्तराधिकारी को लेकर निर्णय ले सकते हैं ताकि संगठनात्मक टूट-फूट की संभावना खत्म हो सके और जेडीयू का ढाँचा मजबूत रहे। हालांकि अंतिम निर्णय कब और कैसे होगा, यह अब भी नीतीश के ही पास सुरक्षित है।






















