जदयू के वरिष्ठ नेता व केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का आरसीपी सिंह (RCP Singh vs Lalan Singh) की जदयू में संभावित वापसी पर दिया बयान सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि जदयू की भविष्य की राजनीति को लेकर चल रही गहरी खींचतान का संकेत है। ललन सिंह ने आरसीपी सिंह को 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू की हार का चेहरा बनाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उसी दौर में पार्टी 71 सीटों से सिमटकर 43 पर आ गई थी। पहली नज़र में यह बयान अतीत का हिसाब-किताब लगता है, लेकिन असल में यह भविष्य की राजनीति को साधने की कोशिश है। क्योंकि जिस आरसीपी सिंह को आज ललन सिंह हार का प्रतीक बना रहे हैं, वही आरसीपी सिंह 2020 के चुनाव के बाद नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने गए थे।
यह वही समय था जब चुनाव में खराब प्रदर्शन के बावजूद नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। यह फैसला साफ इशारा था कि नीतीश कुमार की नजर में हार की जिम्मेदारी आरसीपी सिंह पर नहीं थी। अगर 43 सीटों की हार का ठीकरा उन्हीं के सिर फोड़ना होता, तो राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी उन्हें कभी नहीं मिलती। यही तथ्य आज ललन सिंह के बयान को राजनीतिक तौर पर कमजोर और रणनीतिक तौर पर संदिग्ध बनाता है।
2020 की हार को अगर ईमानदारी से देखा जाए तो उसकी वजह संगठन नहीं, बल्कि उस वक्त की राजनीतिक परिस्थितियां थीं। चिराग पासवान ने जदयू उम्मीदवारों के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोला और लगभग 36 सीटों पर पार्टी को सीधा नुकसान पहुंचाया। उपेंद्र कुशवाहा अलग धड़े में थे और उनके समीकरणों ने करीब 20 सीटों पर जदयू की मुश्किलें बढ़ाईं। यानी जदयू की हार किसी एक व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि गठबंधन की सियासत का नतीजा थी।
इसके बावजूद चुनाव के तुरंत बाद आरसीपी सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना यह बताता है कि नीतीश कुमार उन्हें जिम्मेदार नहीं, बल्कि भरोसेमंद मानते थे। यहीं से ललन सिंह और आरसीपी सिंह के बीच सियासी दूरी की कहानी शुरू होती है। ललन सिंह उस वक्त भी पार्टी में मजबूत नेता थे और राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की दौड़ में थे, लेकिन नीतीश कुमार की पसंद आरसीपी सिंह बने।
RCP सिंह की JDU में No Entry.. ललन सिंह ने साफ़ कह दिया !
बाद में जब आरसीपी सिंह केंद्र में मंत्री बने और जदयू अध्यक्ष पद से हटे, तब ललन सिंह को यह जिम्मेदारी मिली। यह पद जरूर बड़ा था, लेकिन राजनीतिक संदेश साफ था। केंद्र में मंत्री आरसीपी बने, ललन सिंह नहीं। यहीं से यह धारणा मजबूत होती है कि ललन सिंह की नाराजगी सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं, बल्कि दिल्ली की राजनीति से भी जुड़ी है।
इसके बाद हालात बदले और आरसीपी सिंह जदयू से बाहर हो गए। आज वे पार्टी का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन उनकी संभावित वापसी की चर्चा ने जदयू की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। यही वजह है कि ललन सिंह का 2020 की हार वाला बयान अंदरूनी नहीं, बल्कि बाहरी दबाव को रोकने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। यह बयान दरअसल आरसीपी सिंह के लिए सियासी दरवाज़ा बंद करने की कोशिश है।
खास बात यह है कि 2020 और 2025 के राजनीतिक हालात में ज़मीन-आसमान का फर्क है। 2025 में चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा दोनों एनडीए में जदयू के साथ हैं। इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर दिखा, जब जदयू ने 101 सीटों पर चुनाव लड़कर 84 सीटें जीत लीं। यह आंकड़ा बताता है कि समस्या पार्टी में नहीं, बल्कि गठबंधन के गणित में थी।
आज जदयू में नीतीश कुमार के बाद की राजनीति को लेकर चर्चा तेज है। ललन सिंह खुद को इस दौड़ में मजबूत दावेदार मानते हैं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि अगर आरसीपी सिंह की जदयू में वापसी होती है, तो उनका कद संगठन और दिल्ली दोनों स्तरों पर ललन सिंह के लिए चुनौती बन सकता है। आरसीपी सिंह की सोशल इंजीनियरिंग और केंद्र से जुड़े अनुभव जदयू के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
यही वह बिंदु है जहां ललन सिंह की चिंता साफ दिखती है। आरसीपी सिंह के लौटने का मतलब जदयू में सत्ता संतुलन का बदलना होगा। जिन फैसलों में आज ललन सिंह की निर्णायक भूमिका है, वहां आरसीपी सिंह की मौजूदगी उनके प्रभाव को सीमित कर सकती है। इसी आशंका के चलते आरसीपी सिंह को बार-बार जदयू की हार का चेहरा बनाकर पेश किया जा रहा है।
असल में यह टकराव फिलहाल जदयू के भीतर नहीं, बल्कि जदयू के दरवाज़े पर खड़े एक नेता और पार्टी की मौजूदा नेतृत्व संरचना के बीच है। यह लड़ाई इस बात की है कि जदयू आगे किस दिशा में जाएगा। एक तरफ ललन सिंह हैं, जो मौजूदा सत्ता संतुलन को बनाए रखना चाहते हैं। दूसरी तरफ आरसीपी सिंह हैं, जिनकी वापसी जदयू की सोशल इंजीनियरिंग को मजबूती दे सकती है। सवाल यही है कि नीतीश कुमार इस सियासी रस्साकशी में किस तरफ वजन डालते हैं। यही फैसला जदयू की अगली राजनीति की दिशा तय करेगा।






















