Jehanabad NEET student case: जहानाबाद की नीट छात्रा के साथ आखिर हुआ क्या था? यह सवाल अब सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं रहा, बल्कि बिहार की पुलिस व्यवस्था और जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर सीधा हमला बन चुका है। जिस केस को शुरुआती दिनों में संदिग्ध हालात या बीमारी से जुड़ी मौत बताया गया, वही अब फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद दुष्कर्म और गंभीर आपराधिक साजिश की ओर इशारा कर रहा है। एफएसएल की रिपोर्ट ने पटना पुलिस और एसआईटी की पूरी थ्योरी को कमजोर कर दिया है और अब इस मामले में तीसरी जांच एजेंसी के रूप में सीआईडी की एंट्री तय मानी जा रही है।
बीते दस दिनों में इस केस ने कई मोड़ लिए हैं। पहले स्थानीय पुलिस जांच करती रही, फिर मामला तूल पकड़ने पर एसआईटी बनाई गई, और अब जब एसआईटी की जांच में बड़ी खामियां उजागर हुईं तो सरकार को मजबूरन सीआईडी को जांच सौंपने की तैयारी करनी पड़ रही है। यह अपने आप में बताता है कि शुरुआती जांच न सिर्फ सुस्त रही बल्कि कई अहम सवालों से बचती हुई नजर आई।
एफएसएल रिपोर्ट में जो खुलासा हुआ है, उसने पूरे केस की दिशा बदल दी है। छात्रा के अंडर गारमेंट्स पर स्पर्म मिलने की पुष्टि हुई है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में प्राइवेट पार्ट पर चोट के निशान दर्ज किए गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि छात्रा के साथ यौन हिंसा की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। यह वही बात है जिसे परिजन शुरू से कहते आ रहे थे, लेकिन पुलिस ने लंबे समय तक इसे गंभीरता से नहीं लिया।
डीजीपी को सौंपी गई एसआईटी की बेसिक रिपोर्ट में भी कई कमियां सामने आई हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि छात्रा के साथ दुष्कर्म किसने किया, यह घटना हॉस्टल में हुई या बाहर, और कपड़ों पर मिला स्पर्म किसका है। इन सवालों का जवाब अब सीआईडी को तलाशना होगा।
इस पूरे मामले में जांच की दिशा पर गंभीर सवाल उठे हैं। शुरुआत में एसआईटी ने इसे मारपीट या संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत की थ्योरी पर टिकाए रखा। जबकि इतने गंभीर संकेत मिलने के बाद भी रेप की आशंका को प्राथमिकता नहीं दी गई। इस दौरान न तो हॉस्टल को समय पर सील किया गया और न ही अहम सबूत सुरक्षित किए गए। जांच का फोकस हॉस्टल से हटाकर गांव और परिवार के इर्द-गिर्द घुमाया जाता रहा।
शंभू गर्ल्स हॉस्टल इस केस का केंद्र बिंदु है। छात्रा यहीं रहती थी और यहीं से बेहोशी की हालत में मिली थी। इसके बावजूद हॉस्टल मालिक को रिमांड पर नहीं लिया गया और न ही संचालक, स्टाफ या केयरटेकर से सख्ती से पूछताछ हुई। सीसीटीवी फुटेज आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया और यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि फुटेज मौजूद है या नहीं। इसके उलट छात्रा के माता-पिता, मामा और रिश्तेदारों से लगातार पूछताछ होती रही। परिजन बार-बार कहते रहे कि उनकी बेटी मरी है और पुलिस उन्हीं पर शक कर रही है।
मेडिकल जांच को लेकर भी बड़ी लापरवाही सामने आई है। एसआईटी ने मेडिकल निष्कर्ष के लिए एम्स का रुख किया, लेकिन एम्स को पूरे दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं कराए गए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट, वीडियोग्राफी और फॉरेंसिक रिपोर्ट के बिना किसी नतीजे पर पहुंचना असंभव था। इसके बावजूद एसआईटी ने डीजीपी को एक प्रारंभिक रिपोर्ट सौंप दी। यही वह बिंदु है जहां जांच की विश्वसनीयता पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ।
फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद अब बहस इस बात पर नहीं रह गई कि कुछ गलत हुआ या नहीं, बल्कि असली सवाल यह है कि यह घटना कहां हुई और कैसे हुई। इसी बीच मृतिका के पिता ने बिहार के डीजीपी को एक पत्र लिखकर आठ अहम मांगें रखी हैं। उन्होंने साफ कहा है कि मौजूदा जांच से उन्हें संतोष नहीं है और अब पूरे मामले की निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच जरूरी है।
पिता की मांग है कि 5 जनवरी की शाम 5 बजे से 6 जनवरी तक के सभी सीसीटीवी फुटेज की एफएसएल जांच कराई जाए। हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं के बयान लिए जाएं और उनके मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच हो। हॉस्टल के मकान मालिक मनीष रंजन के पिछले दरवाजे और आसपास की गलियों की सीसीटीवी फुटेज की भी फॉरेंसिक जांच कराई जाए। मनीष रंजन और उसके बेटे के मोबाइल सीडीआर की जांच हो। हॉस्टल संचालिका नीलम अग्रवाल और उनके बेटे अंशु अग्रवाल के मोबाइल रिकॉर्ड खंगाले जाएं। प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल से जुड़े डॉक्टरों सहजानंद प्रसाद सिंह, सतीश कुमार, अभिषेक और महिला डॉक्टर जया के मोबाइल सीडीआर की भी जांच की जाए। चित्रगुप्त नगर थाना प्रभारी रोशनी कुमारी की भूमिका की स्वतंत्र जांच हो।
पिता ने यह भी बताया कि 7 जनवरी को अस्पताल की एक नर्सिंग स्टाफ ने उनकी पत्नी से कहा था कि लड़की के साथ बहुत गलत हुआ है। उस नर्स की पहचान कर उसका बयान दर्ज किया जाए। इसके अलावा छात्रा के कपड़े अब तक परिजनों को नहीं सौंपे गए हैं, जबकि वही कपड़े इस केस में सबसे अहम सबूत हो सकते हैं। इलाज के दौरान बार-बार मेडिकल थ्योरी बदली गई। कभी वायरल मेनजाइटिस, कभी सिर में खून जाने की बात कही गई और फिर मौत को नींद की दवा से जोड़ने की कोशिश की गई। परिजन सवाल उठा रहे हैं कि जब सभी जांच रिपोर्ट मौजूद थीं तो मौत की वजह बदलने की जरूरत क्यों पड़ी।
अब इस पूरे मामले में दो पुलिसकर्मियों के निलंबन, सीआईडी की एंट्री और गृह मंत्री सम्राट चौधरी की सख्ती यह संकेत दे रही है कि सरकार भी मान रही है कि शुरुआती जांच सही दिशा में नहीं थी। यह केस अब सिर्फ एक छात्रा की मौत का मामला नहीं रहा, बल्कि यह सिस्टम की जवाबदेही का टेस्ट बन चुका है।


















