राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) ने VB-G RAM G बिल 2025 और संसद की कार्यप्रणाली को लेकर केंद्र सरकार पर सीधे और गंभीर सवाल खड़े किए। सिब्बल ने कहा कि मनरेगा जैसी योजना ने कोरोना काल में गरीबों को जीवन रेखा दी थी, लेकिन आज उसी योजना को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उनके मुताबिक अगर कोविड के कठिन दौर में मनरेगा न होती तो हालात और भी भयावह हो सकते थे, क्योंकि यही योजना थी जिसने लाखों गरीब परिवारों को न्यूनतम राहत दी।
कपिल सिब्बल ने मनरेगा के फंडिंग पैटर्न में बदलाव को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पहले इस योजना में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत और राज्यों की 10 प्रतिशत हुआ करती थी, लेकिन अब केंद्र ने अपना योगदान घटाकर 60 प्रतिशत कर दिया है और राज्यों पर 40 प्रतिशत का बोझ डाल दिया गया है। सिब्बल के अनुसार अधिकांश राज्य सरकारें पहले से ही आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि जब राज्यों के पास संसाधन ही नहीं हैं तो योजना को जमीन पर कैसे लागू किया जाएगा। उन्होंने इसे गरीब विरोधी फैसला बताते हुए कहा कि इससे सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं लोगों को होगा जिनके लिए यह योजना बनाई गई थी।
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सांसद सिब्बल ने संसद में चर्चा के मुद्दों को लेकर भी सरकार पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि दिसंबर में विपक्ष चाहता था कि SIR जैसे गंभीर और समसामयिक मुद्दे पर विस्तृत चर्चा हो, क्योंकि यह देश के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल है। लेकिन इसके बजाय सदन में वंदे मातरम् जैसे विषयों को प्राथमिकता दी गई, जिनका मौजूदा परिस्थितियों से कोई सीधा संबंध नहीं है। सिब्बल ने सवाल उठाया कि राष्ट्रवाद की बातें करने वाले लोग असल मुद्दों से क्यों बचते हैं और गरीबों की सुरक्षा पर चुप क्यों रहते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि आज संसद की प्रासंगिकता धीरे-धीरे कम होती जा रही है, जो लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है। सिब्बल के अनुसार संसद का काम जनता के असली मुद्दों पर बहस करना है, लेकिन अब स्थिति यह हो गई है कि जरूरी विषयों पर चर्चा ही नहीं होती। उन्होंने पिछले वर्षों के संसदीय सत्रों का जिक्र करते हुए बताया कि शीतकालीन सत्र में महज 15 दिन कामकाज हुआ, जबकि इससे पहले भी कई सत्र औसतन 13-14 दिनों तक ही सीमित रहे। सिब्बल ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने का संकेत बताया।
कपिल सिब्बल ने सत्ता पक्ष पर यह आरोप भी लगाया कि उन्हें संसद की गरिमा और जनता के सवालों से कोई सरोकार नहीं रह गया है। उनके अनुसार जब गरीबों की योजनाएं कमजोर की जाएं और संसद में सार्थक चर्चा न हो, तो राष्ट्रवाद के दावे खोखले लगने लगते हैं। उन्होंने कहा कि जनता सब देख रही है और असली राष्ट्रवाद वही है जो कमजोर वर्गों की सुरक्षा और लोकतंत्र की मजबूती से जुड़ा हो।






















