Land for Job Case: बिहार की राजनीति और राष्ट्रीय सियासत में लंबे समय से चर्चा में रहे लैंड फॉर जॉब मामले में शुक्रवार को बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव, सांसद मीसा भारती, तेज प्रताप यादव और हेमा यादव समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दे दिया है। इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में नामजद 52 आरोपियों को बरी भी कर दिया है। इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि लालू परिवार के खिलाफ अब विधिवत ट्रायल चलेगा, जिससे आने वाले समय में राजनीतिक सरगर्मी और तेज होने के आसार हैं।
सीबीआई की चार्जशीट पर फैसला सुनाते हुए विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत ने माना कि प्रारंभिक स्तर पर ऐसे पर्याप्त आधार हैं, जिनके आधार पर आरोपियों पर मुकदमा चलाया जा सकता है। यह मामला उस दौर से जुड़ा है, जब लालू प्रसाद यादव यूपीए सरकार में रेल मंत्री थे। जांच एजेंसियों का आरोप है कि रेलवे में ग्रुप डी की नौकरियों के बदले अभ्यर्थियों और उनके परिजनों से जमीनें बेहद कम कीमत पर या कथित तौर पर उपहार के रूप में लालू परिवार और उनके करीबी लोगों के नाम ट्रांसफर कराई गईं।
शुक्रवार की सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी को छोड़कर बाकी सभी प्रमुख आरोपी अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव की मौजूदगी ने इस सुनवाई को राजनीतिक रूप से और अहम बना दिया। अदालत ने साफ किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत इन आरोपियों के खिलाफ मुकदमा आगे बढ़ेगा। अब इस मामले में गवाहों की पेशी और सबूतों की जांच का लंबा दौर शुरू होगा।
इस केस की जड़ें उस समय से जुड़ी हैं, जब रेलवे में बड़ी संख्या में नियुक्तियां की जा रही थीं। सीबीआई का दावा है कि चयन प्रक्रिया को प्रभावित कर लोगों को नौकरी दिलाने के बदले जमीनें ली गईं और उन्हें परिवार के अलग-अलग सदस्यों के नाम पर रजिस्टर्ड कराया गया। जांच एजेंसी ने इसे एक सुनियोजित साजिश बताते हुए इसे आपराधिक षड्यंत्र का मामला करार दिया है। वहीं, लालू परिवार शुरू से इन आरोपों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताता रहा है और दावा करता रहा है कि कोई भी लेनदेन कानूनी प्रक्रिया के बाहर नहीं हुआ।
अदालत के इस आदेश का एक अहम पहलू यह भी है कि कुल 103 नामजद आरोपियों में से 52 को बरी कर दिया गया है। इनमें से पांच आरोपियों की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी। शेष आरोपियों के खिलाफ अदालत को पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले, जिसके आधार पर उन्हें ट्रायल का सामना करना पड़े। यह फैसला यह भी दिखाता है कि अदालत ने चार्जशीट की बारीकी से जांच की और केवल उन्हीं आरोपियों के खिलाफ मुकदमे का रास्ता खोला, जिनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मजबूत आधार नजर आया।
हालांकि आरोप तय होना अपने आप में दोष सिद्धि नहीं है, लेकिन यह जरूर तय करता है कि मामला अब औपचारिक रूप से ट्रायल के चरण में पहुंच चुका है। ऐसे मामलों में सुनवाई लंबी चल सकती है और राजनीतिक असर भी दूरगामी हो सकता है, खासकर तब जब बिहार की राजनीति पहले से ही चुनावी मोड में रहने की तैयारी कर रही है। तेजस्वी यादव विपक्ष के प्रमुख चेहरे हैं और लालू यादव अब भी आरजेडी की रणनीति और दिशा तय करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।






















