लोकसभा के शीतकालीन सत्र के सातवें दिन चुनाव सुधार (Lok Sabha Election Reforms) को लेकर हुई महत्वपूर्ण बहस राजनीति के तापमान को और बढ़ा गई। चुनाव प्रक्रिया, ईवीएम की विश्वसनीयता, वोटर लिस्ट पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की भूमिका जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने दिखे। चर्चा के दौरान केन्द्रीय मंत्री ललन सिंह ने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस और राहुल गांधी पर तीखे वार किए।
ललन सिंह ने कहा कि भारत की चुनाव प्रक्रिया दुनिया की सबसे पारदर्शी और भरोसेमंद प्रक्रिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष बार-बार ईवीएम पर सवाल उठाकर जनता के भरोसे को कमजोर करने की कोशिश करता है, जबकि इन्हीं मशीनों से कांग्रेस-led UPA ने दस साल तक सत्ता चलाई। उन्होंने कहा कि जनता जब विपक्ष को वोट नहीं देती, तब ईवीएम पर सवाल खड़े किए जाते हैं, लेकिन जब कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल या बंगाल में जीत मिलती है, तब यही मशीनें सही दिखाई देती हैं।
ललन सिंह ने बिहार के चुनावों का उदाहरण देते हुए कहा कि विपक्ष ने नतीजों से पहले ही शपथग्रहण की तारीख बता दी थी, लेकिन परिणामों ने उनकी जमीन खिसका दी। उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि “पहले संविधान की किताब लेकर घूमते थे, अब नहीं दिखाते, क्योंकि कांग्रेस खुद संविधान के खिलाफ काम कर रही है।”
नागरिकता सत्यापन (SIR) और चुनाव आयोग के फैसलों का समर्थन करते हुए मंत्री ने कहा कि आयोग नागरिकता प्रमाण पर सवाल पूछता है तो इसमें समस्या क्यों होनी चाहिए? उन्होंने दावा किया कि बिहार के दो जिलों में पांच लाख लोगों ने नागरिकता प्रमाण के लिए आवेदन किया था—यह संख्या खुद कई सवाल खड़े करती है। उन्होंने कहा कि SIR पर सुप्रीम कोर्ट में विस्तृत बहस हो चुकी है और विपक्ष का इस मुद्दे को संसद में बार-बार उठाना सिर्फ राजनीति है।
ललन सिंह ने कहा कि मोदी सरकार किसी संवैधानिक संस्था पर दबाव नहीं डालती जबकि कांग्रेस के शासनकाल में ऐसा होता आया है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस काल के एक चुनाव आयुक्त का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें राज्यसभा भेज दिया गया और कैबिनेट में जगह भी दे दी गई।






















