भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली मनरेगा योजना (MNREGA Controversy) एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। इस बार मुद्दा सिर्फ नाम बदलने का नहीं, बल्कि उस अधिकार-आधारित सोच का है, जिसने करोड़ों ग्रामीण परिवारों को आर्थिक सुरक्षा का भरोसा दिया। राज्यसभा सांसद और राजद नेता मनोज झा ने केंद्र सरकार के फैसले पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि किसी के नाम में ‘राम’ होने से उसे हर तरह के फैसले लेने की खुली छूट नहीं मिल जाती। उनका यह बयान केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि सरकार की नीतिगत दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मनोज झा का तर्क है कि मनरेगा महज एक रोजगार योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के लिए सुरक्षा कवच रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पहले इस योजना में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच 90-10 प्रतिशत का वित्तीय अनुपात था, जिसे अब घटाकर 60-40 प्रतिशत कर दिया गया है। उनके मुताबिक, यह बदलाव राज्यों पर अतिरिक्त बोझ डालता है और योजना की मूल भावना को कमजोर करता है। झा ने यह भी दावा किया कि इस फैसले से केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि भाजपा और एनडीए के भीतर भी असंतोष है।
राजद सांसद ने सरकार पर अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को नकारने का आरोप लगाते हुए कहा कि मनरेगा जैसी योजना ने देश को सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा से बचाने में बड़ी भूमिका निभाई है। उनके अनुसार, योजना को और मजबूत करने के बजाय उसका नाम बदलना और संरचना में बदलाव करना उसकी आत्मा को नष्ट करने जैसा है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि सरकार को ऐसी सलाह कौन दे रहा है, जो एक स्थापित और प्रभावी योजना को कमजोर करने की दिशा में ले जा रही है।
इस पूरे विवाद के बीच केंद्र सरकार ने लोकसभा में विकसित भारत–रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 पेश किया है, जिसे वीबी-जी राम-जी विधेयक के नाम से भी जाना जा रहा है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पेश इस विधेयक का उद्देश्य करीब दो दशक पुराने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को प्रतिस्थापित करना बताया गया है। जैसे ही विधेयक सदन में आया, विपक्षी सांसदों ने जोरदार विरोध दर्ज कराया और इसे गरीबों के अधिकारों पर चोट करार दिया।






















