बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बीच मोकामा में हुई हिंसक (Mokama Violence Case) घटना अब सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति का बड़ा नैरेटिव बन चुकी है। अक्टूबर के आखिरी दिनों में चुनावी प्रचार के दौरान भड़की हिंसा ने जिस तरह एक वरिष्ठ नेता की जान ले ली, उसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया, कानून-व्यवस्था और सत्ता के प्रभाव जैसे सवालों को फिर से केंद्र में ला दिया। इसी मामले में बाहुबली छवि वाले नेता और नवनिर्वाचित विधायक अनंत सिंह को ताजा झटका लगा है, जब विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी।
यह पूरा मामला 29 और 30 अक्टूबर का है, जब मोकामा विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार अपने चरम पर था। जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में 75 वर्षीय दुलारचंद यादव प्रचार कर रहे थे। दुलारचंद यादव मोकामा की राजनीति में कोई नया नाम नहीं थे। वे कभी लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे दिग्गज नेताओं के करीबी रहे और इलाके में उनकी दबंग पहचान थी। उसी दौरान अनंत सिंह के काफिले और विरोधी पक्ष के समर्थकों के बीच विवाद हुआ, जो पहले गाली-गलौज और फिर देखते ही देखते मारपीट और फायरिंग में बदल गया।
आरोप है कि इस झड़प में दुलारचंद यादव के पैर में गोली लगी। परिजनों का कहना है कि गोली मारने के बाद उन पर वाहन चढ़ाकर जान ली गई। पुलिस जांच में मौत का कारण भारी वस्तु के गुजरने से बताया गया, हालांकि गोली लगने की बात भी केस डायरी में दर्ज है। इस पूरी घटना में अनंत सिंह को मुख्य आरोपी माना गया, जिससे मामला और ज्यादा हाई-प्रोफाइल बन गया।
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घटना के कुछ ही दिनों बाद, 2 नवंबर को पटना पुलिस ने अनंत सिंह को उनके दो साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया और उन्हें बेऊर जेल भेज दिया गया। जांच का दायरा लगातार बढ़ता गया और अब तक इस केस में 80 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। पटना पुलिस के साथ-साथ सीआईडी भी मामले की जांच कर रही है। दिलचस्प पहलू यह रहा कि जेल में रहते हुए भी अनंत सिंह ने मोकामा सीट से चुनाव लड़ा और करीब 28 हजार वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। यह उनकी छठी विधानसभा जीत थी, जिसने एक बार फिर उनके राजनीतिक प्रभाव और जनाधार को दिखाया।
हालांकि चुनावी जीत भी उन्हें कानूनी राहत नहीं दिला सकी। गिरफ्तारी के बाद से अनंत सिंह लगातार जमानत की कोशिश में थे। इससे पहले भी उनकी अर्जियां खारिज हो चुकी थीं और अब पटना की एमपी-एमएलए कोर्ट में दायर ताजा याचिका पर भी उन्हें निराशा हाथ लगी। 16 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने मामले की गंभीरता और आरोपों की प्रकृति को देखते हुए जमानत से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इसी आदेश में अनंत सिंह के भतीजे राजवीर सिंह और कर्मवीर सिंह की अग्रिम जमानत भी रद्द कर दी, जो फिलहाल फरार बताए जा रहे हैं।
जमानत खारिज होने का सीधा असर यह है कि विधायक चुने जाने के बावजूद अनंत सिंह अब तक शपथ ग्रहण नहीं कर पाए हैं और न ही विधानसभा की कार्यवाही में शामिल हो सके हैं। मोकामा की राजनीति में उनकी पकड़ अभी भी मजबूत मानी जाती है, लेकिन यह केस उनके राजनीतिक भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा है। पुलिस अब तक चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी है, जिससे जांच की दिशा और समय-सीमा को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। अनंत सिंह के वकील का कहना है कि उनके मुवक्किल के खिलाफ प्रत्यक्ष और ठोस सबूत नहीं हैं और जल्द ही हाईकोर्ट में अपील दायर की जाएगी।






















