रायपुर: छत्तीसगढ़ में लगातार एनकाउंटरों ने नक्सलियों के हौसले पस्त कर दिए हैं। नक्सलवाद के खात्मे की कगार पर पहुंचते देख प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय समिति ने मध्य भारत में जंग को फौरन रोकने की अपील की है। समिति ने भारत सरकार और माओवादियों दोनों से बिना शर्त युद्धविराम की मांग करते हुए शांति वार्ता का रास्ता खोलने की बात कही है। नक्सलियों का दावा है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने ‘का
गर’ नाम से एक तीखा आतंकवाद-विरोधी अभियान शुरू किया, जिसमें राज्य सरकारों का साथ मिला। इस अभियान ने माओवादी इलाकों में हिंसा, हत्याएं और गिरफ्तारियों का दौर ला दिया। उनके मुताबिक, 400 से ज्यादा माओवादी नेता, कार्यकर्ता और आदिवासी इस दौरान मारे गए। शांति की शर्तें और सरकार पर हमला माओवादियों ने शांति वार्ता के लिए कुछ मांगें रखीं- आदिवासी क्षेत्रों से सुरक्षा बलों की तुरंत वापसी, नई सैन्य तैनाती पर रोक और आतंकवाद-विरोधी अभियानों को बंद करना। उन्होंने सरकार पर आदिवासी समुदायों के खिलाफ ‘नरसंहार युद्ध’ छेड़ने और क्रांतिकारी आंदोलनों को कुचलने का इल्जाम लगाया। साथ ही नागरिक इलाकों में सेना के इस्तेमाल को गैर-कानूनी ठहराया। माओवादियों ने बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार संगठनों, पत्रकारों, छात्रों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं से सरकार पर दबाव बनाने और देशव्यापी अभियान चलाने की गुहार लगाई।
“अभियान बंद करो, हम तैयार हैं”
नक्सलियों ने कहा कि अगर सरकार उनकी शर्तें मान लेती है तो वे बातचीत के लिए तैयार हैं। उनका वादा है कि सैन्य अभियान रुकते ही वे युद्धविराम की घोषणा कर देंगे। यह अपील ऐसे वक्त आई है जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 4 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के दो दिवसीय दौरे पर रायपुर पहुंचने वाले हैं। 5 अप्रैल को शाह दंतेवाड़ा में बस्तर पंडुम महोत्सव के समापन में शामिल होंगे और एंटी-नक्सल ऑपरेशन कमांडरों से मुलाकात करेंगे।
सरकार का जवाब: हिंसा नहीं, मुख्यधारा में लौटें
इस बीच, छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने मंगलवार को कहा कि सरकार नक्सल इलाकों में एक भी गोली नहीं चलाना चाहती। न केंद्र और न ही राज्य सरकार हिंसा को बढ़ावा देना चाहती है। उनका मकसद है कि नक्सली समाज की मुख्यधारा में शामिल हों और सकारात्मक योगदान दें।