बिहार की राजनीति एक बार फिर सम्मान और विरासत की बहस के केंद्र में आ गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भारत रत्न (Nitish Kumar Bharat Ratna) देने की मांग ने ऐसा सियासी मोड़ लिया है, जिसने सहयोगी दलों से लेकर विपक्ष तक को आमने-सामने ला खड़ा किया है। जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता रहे केसी त्यागी की ओर से नीतीश कुमार के लिए भारत रत्न की मांग उठते ही पार्टी ने इससे दूरी बना ली, लेकिन इस दूरी के बीच राजनीति की आंच और तेज हो गई।
इस पूरे घटनाक्रम में नया रंग तब जुड़ गया, जब राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव के लिए भी भारत रत्न की मांग सामने आ गई। यह मांग लालू यादव के बड़े बेटे और जनशक्ति जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेज प्रताप यादव ने सार्वजनिक रूप से रखी। शनिवार को मीडिया से बातचीत में तेज प्रताप यादव ने कहा कि अगर नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की बात हो रही है, तो उनके पिता लालू प्रसाद यादव भी इस सम्मान के हकदार हैं। उनके मुताबिक, यह सिर्फ व्यक्तिगत भावना नहीं बल्कि उनकी पार्टी की आधिकारिक मांग है।
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तेज प्रताप यादव ने भावनात्मक तर्क देते हुए कहा कि लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार लंबे समय तक भाई-भाई की तरह साथ रहे हैं, ऐसे में अगर देश दोनों के योगदान को स्वीकार करता है तो दोनों को समान रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए। उनके इस बयान ने सियासी विमर्श को नई दिशा दे दी है, जहां सम्मान के साथ-साथ राजनीतिक समीकरण और पुराने गठबंधनों की यादें भी चर्चा में आ गई हैं।
दरअसल, नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग कोई नई नहीं है। पिछले दो वर्षों में अलग-अलग मंचों और मौकों पर यह मुद्दा उठता रहा है। समर्थक नीतीश कुमार के सुशासन मॉडल, सामाजिक सुधारों और बिहार की राजनीति में उनकी दीर्घकालिक भूमिका को इसका आधार बताते हैं। वहीं, अब लालू प्रसाद यादव के नाम के जुड़ने से यह बहस और व्यापक हो गई है, जिसमें सामाजिक न्याय की राजनीति और मंडल युग की विरासत भी केंद्र में आ गई है।






















