इस्लामाबाद: पाकिस्तान में बीते दिनों से जारी विद्रोहियों की हलचल के बाद पाक रक्षा विशेषज्ञ ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि दो मोर्चों पर लड़ने में सक्षम नही है पाक आर्मी। बता दें बलूच विद्रोहियों ने पाकिस्तानी सेना पर पिछले कई महीनों से कहर बरपा रखा है। आतंक की बड़ी घटनाऔं को अंजाम देने से भी ये विद्रोही नहीं हिचकिचा रहें हैं। मालूम हो कि पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बीते कुछ महीनों में हालात तेजी से बदले हैं। प्रांत के कई इलाकों में हिंसा की वारदातें हुई हैं, खासतौर से पाक सेना को यहां निशाना बनाया गया है।
कई इलाकों के विद्रोही गुटों के नियंत्रण में चले जाने का दावा किया जा रहा है। हाल में जाफर एक्सप्रेस ट्रेन के हाईजैक होने और नोशकी में सेना के काफिले पर हमले ने साफ कर दिया है कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान के हाथ से चीजें निकल रही हैं। पाकिस्तान में बलूचिस्तान पर नियंत्रण के लिए सैन्य ऑपरेशन पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि पाक सेना के लिए ये आसान नहीं हैं। इंडियन बॉर्डर पर पहले ही पाक सेना की बड़ी तैनाती है। ऐसे में दो फ्रंट पर लड़ना पाकिस्तानी फौज के लिए मुश्किल हो सकता है। पाकिस्तान का खैबर-पख्तूनख्वा 101,741 वर्ग किलोमीटर और बलूचिस्तान 347,190 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।
एक अध्ययन के अनुसार, पाकिस्तान ने 2009-2010 के अपने अभियानों के दौरान करीब 140,000 सैनिक और फ्रंटियर कोर के जवान इन सूबों में तैनात किए थे। दूसरी ओर कश्मीर में नियंत्रण रेखा (LoC) पर घुसपैठ रोकने के लिए भारत करीब 320,000 सैनिकों तैनात करता है। जबकि जम्मू और कश्मीर का क्षेत्रफल 42,241 वर्ग किलोमीटर है, जो खैबर-पख्तूनख्वा से भी कम है। इससे साफ है कि पाक सेना की हिंसा से जूझते इन सूबों में तैनाती पर्याप्त नहीं है। पाकिस्तान के सामने बीचे कुछ समय से आर्थिक चुनौतियां भी बढ़ी हुई हैं। पाकिस्तान के रणनीतिकार इस बात पर राजी नहीं होगे कि एलओसी से सैनिक हटाकर बलूचिस्तान और अफगान सीमा पर भेजे जाएं।
ऐसे में आर्थिक संकट का सामना कर रहे पाकिस्तान को रक्षा खर्च बढ़ाना पड़ सकता है, जो उसके लिए एक नई तरह की चुनौती पैदा करेगा। ऐसे में एक्सपर्ट मान रहे हैं कि शहबाज शरीफ की सरकार आर्मी चीफ असीम मुनीर की चुनौती बढ़ने वाली है। वहीं इस मामले में पाकिस्तान के पत्रकार इम्तियाज बलोच का कहना है कि बलूचिस्तान की सड़कों के बड़े हिस्सा पर या तो विद्रोहियों या डाकुओं का कब्जा है। इससे पार पाने के लिए आसान जवाब हो सकता है कि यहां अधिक सैनिकों को भेजा जाए। हालांकि इसमें बड़ा पेंच ये है कि पाकिस्तान को ऐसा करने के लिए एलओसी पर अपनी सैन्य स्थिति को कमजोर करना होगा।
यानी फिलहाल ऐसा लगता है कि दो मोर्चों पर लड़ाई पाकिस्तानी सेना के लिए मुश्किल है। इतिहासकार सना हारून का कहना है कि पाकिस्तान उसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे कभी ब्रिटिश शासन ने किया था। पाक सेना भी अंग्रेजों की तरह अटैक की बात कर रही है लेकिन इतिहास बताता है कि सैन्य ताकत से इसका समाधान नहीं होगा। इसके लिए राजनीतिक और आर्थिक रूप से काम करना जरूरी है। ब्रिटिश को भी इसी तरीके से आखिर में यहां कामयाबी मिली थी। जब उन्होंने यहां के लोगों से बात करते हुए उनको शांत किया था। पाकिस्तान को भी अपनी सेना और संसाधनों का इस्तेमाल करने की बजाय स्थानीय लोगों के साथ बातचीत करनी चाहिए और उन्हें मुख्यधारा में लाना चाहिए।