Patna NEET Student Death: पटना की हवा में एक बार फिर इंसाफ की पुकार तैर रही है। नीट की तैयारी कर रही एक होनहार छात्रा की संदिग्ध मौत अब सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रही, बल्कि यह मामला प्रशासनिक लापरवाही, मेडिकल प्रक्रिया की उलझनों और जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता पर गहरे सवाल खड़े कर रहा है। जिस छात्रावास में भविष्य गढ़ने के सपने देखे जाते हैं, वही अब शक और आशंकाओं के घेरे में आ गया है।
शनिवार को मृतिका के परिजन सीधे बिहार के पुलिस महानिदेशक विनय कुमार से मिले। करीब आधे घंटे चली इस मुलाकात में उन्होंने मौजूदा एसआईटी जांच की दिशा और निष्पक्षता पर खुलकर असंतोष जताया। परिजनों का कहना है कि अब तक जो जांच हुई है, वह सवालों से ज्यादा जवाब छुपाने वाली लगती है। मृतिका के पिता ने डीजीपी को लिखित आवेदन सौंपते हुए मांग की कि पूरे मामले की वैज्ञानिक, पारदर्शी और निष्पक्ष जांच हो, ताकि किसी भी स्तर पर सच्चाई दब न सके।
परिजनों की सबसे बड़ी मांग 5 जनवरी की शाम 5 बजे से लेकर 6 जनवरी तक के सभी सीसीटीवी फुटेज की एफएसएल जांच को लेकर है। उनका तर्क है कि छात्रावास के भीतर और बाहर लगे कैमरों के फुटेज अगर वैज्ञानिक तरीके से जांचे जाएं तो कई अहम कड़ियां सामने आ सकती हैं। इसके साथ ही हॉस्टल और मेस के रजिस्टर की गहन पड़ताल की मांग की गई है। परिजनों का यह भी कहना है कि इन दस्तावेजों की प्रमाणिक प्रतियां उन्हें उपलब्ध कराई जाएं, ताकि जांच प्रक्रिया पर भरोसा कायम रह सके।
दूसरे बिंदु में हॉस्टल के मकान मालिक मनीष रंजन के पिछले दरवाजे, आसपास की गलियों और सड़कों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की एफएसएल जांच की मांग रखी गई है। साथ ही मनीष रंजन और उनके बेटे के मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड खंगालने की बात कही गई है। परिजनों के अनुसार यह कदम इसलिए जरूरी है ताकि घटना के समय उनकी गतिविधियों का स्पष्ट चित्र सामने आ सके।
तीसरे बिंदु में छात्रावास की संचालिका नीलम अग्रवाल, उनके पति श्रवण अग्रवाल और बेटे अंशु अग्रवाल के मोबाइल रिकॉर्ड की जांच की मांग उठी है। परिजनों का आरोप है कि इन सभी की भूमिका और गतिविधियों की गंभीरता से जांच किए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना केवल औपचारिकता होगी।
मामले ने तब और गंभीर मोड़ लिया जब प्रभात हॉस्पिटल से जुड़े डॉक्टरों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए। डॉक्टर सहजानंद प्रसाद सिंह, डॉक्टर सतीश कुमार, डॉक्टर अभिषेक और महिला डॉक्टर जया के इलाज के दौरान बार-बार बदले गए मेडिकल थ्योरी पर परिजनों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि एक ही मरीज के इलाज में कारणों का बार-बार बदलना संदेह को और गहरा करता है। इसी वजह से इन सभी डॉक्टरों के मोबाइल सीडीआर की जांच की मांग की गई है।
परिजनों ने चित्रगुप्त नगर थाना प्रभारी रोशनी कुमारी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि शुरू से ही पुलिस की भूमिका संदेह के घेरे में रही है और कई अहम पहलुओं को नजरअंदाज किया गया। इसलिए थाना प्रभारी की भूमिका की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
मामले में एक बेहद संवेदनशील आरोप अस्पताल के एक नर्सिंग स्टाफ से जुड़ा है। परिजनों का दावा है कि भर्ती के समय उस नर्स ने छात्रा की मां से कहा था कि लड़की के साथ बहुत गलत हुआ है। अब परिजन चाहते हैं कि उस नर्स की पहचान कर उसका बयान दर्ज किया जाए और सीसीटीवी फुटेज तथा ड्यूटी रजिस्टर के आधार पर उसकी मौजूदगी की पुष्टि हो।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि छात्रा के कपड़े अब तक परिजनों को नहीं सौंपे गए हैं और इलाज के दौरान बार-बार बदली गई मेडिकल थ्योरी को लेकर भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। परिजनों का सीधा सवाल है कि जब सभी जांच रिपोर्ट मौजूद थीं तो नींद की दवा से मौत की कहानी किस आधार पर बनाई गई।
अब पूरे मामले में निगाहें डीजीपी और एसआईटी की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जांच होगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या सच्चाई तक पहुंचने की ईमानदार कोशिश की जाएगी या यह मामला भी फाइलों और रिपोर्टों के ढेर में दबकर रह जाएगा।






















