पटना में नीट की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत (Patna NEET Student Death) का मामला अब सिर्फ एक आपराधिक जांच नहीं, बल्कि बिहार की कानून-व्यवस्था और शासन की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल बनता जा रहा है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे सियासी सरगर्मी भी तेज होती जा रही है। राज्य सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए SIT का गठन किया है, जो हॉस्टल के कमरे से लेकर वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज तक हर पहलू की बारीकी से जांच कर रही है। लेकिन जांच की रफ्तार और अब तक हुई कार्रवाई को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है।
बीते शनिवार को पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने इस केस को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए थे। अब राजद नेता रोहिणी आचार्य के सोशल मीडिया पोस्ट ने मामले को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। उन्होंने एक्स प्लेटफॉर्म पर सरकार से सीधे और तीखे सवाल पूछते हुए लिखा कि “पूछता है बिहार, कब होंगे आरोपी गिरफ्तार?” उनके सवाल सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे जांच तंत्र और प्रशासनिक मंशा पर सवालिया निशान खड़े करते हैं।
रोहिणी आचार्य ने अपने पोस्ट में कहा कि पटना हॉस्टल रेप कांड में अब तक न तो हॉस्टल संचालक अग्रवाल दंपत्ति की गिरफ्तारी हुई है और न ही उनके आरोपी पुत्र को हिरासत में लिया गया है। इसके साथ ही उन्होंने प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल और वहां के डॉक्टरों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि साक्ष्यों के साथ आपराधिक छेड़छाड़ करने के बावजूद न तो संबंधित डॉक्टर की गिरफ्तारी हुई और न ही अस्पताल को सील किया गया। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जांच वास्तव में निष्पक्ष है या फिर रसूखदार आरोपियों को बचाने की कवायद चल रही है।
उन्होंने आगे यह भी पूछा कि क्या बिहार में बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर मामलों में आरोपियों को सबूत मिटाने और केस “मैनेज” करने के लिए समय दिया जा रहा है। रोहिणी आचार्य का कहना है कि जब राज्य में महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा को लेकर पहले से ही गंभीर चिंताएं हैं, तब ऐसे मामलों में देरी और ढिलाई सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब रोहिणी आचार्य ने इस केस में अस्पताल और डॉक्टरों की भूमिका पर सवाल उठाए हों। इससे पहले भी उन्होंने आरोप लगाया था कि शम्भू गर्ल्स हॉस्टल की पीड़िता के इलाज के दौरान प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल में उसके शरीर पर मौजूद जख्मों के निशानों को नजरअंदाज किया गया, पुलिस और प्रशासन को सूचना दिए बिना इलाज किया गया और परिजनों को सच्चाई से अवगत नहीं कराया गया। उनके अनुसार, यह सब साक्ष्यों के साथ आपराधिक छेड़छाड़ की श्रेणी में आता है और प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है।






















