कांग्रेस पार्टी ने बिहार में अपनी टीम का चेहरा बदलकर “सामाजिक न्याय” का नारा दिया, लेकिन जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में सवर्णों और भूमिहारों का वर्चस्व एक बार फिर पार्टी की “रणनीतिक ढोंग नीति” को उजागर कर गया है। प्रदेश अध्यक्ष पद पर दलित नेता राजेश राम को बैठाकर पार्टी ने मीडिया हेडलाइन्स तो बटोर लीं, मगर जिला अध्यक्षों की सूची में 14 सवर्ण और 6 भूमिहारों की नियुक्ति हुई है।
अध्यक्ष पद पर दलित, मगर जिलों में सवर्णों का ‘कब्जा‘
कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह (भूमिहार) को हटाकर राजेश राम (दलित) को चुनकर “दलित चेहरे” की राजनीति का संकेत दिया। लेकिन, जिलाध्यक्षों की 40 सीटों में सवर्णों को 14 (35%) और भूमिहारों को 6 (15%) पद दिए गए हैं। इसके अलावा ब्राह्मण 4, राजपूत 3, और कायस्थ 1 को पद मिला है।
सवर्णों को ज्यादा, ओबीसी और दलितों को कम प्रतिनिधित्व
कांग्रेस ने भूमिहारों को सबसे ज्यादा 6 जिलाध्यक्ष दिए, जिससे यह साफ है कि पार्टी इस परंपरागत सवर्ण वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखना चाहती है। ओबीसी (10) में यादवों को सबसे ज्यादा (5) पद मिले। कुर्मी और कुशवाहा समुदाय को क्रमशः 2 और 3 पद मिले हैं। दलितों को 5 पद मिले, जिनमें पासवान 3 और रविदास 2 को जगह मिली। अल्पसंख्यकों को 7 जिलाध्यक्ष दिए गए, जिनमें मुस्लिमों की संख्या 6 और सिख 1 शामिल है। अति पिछड़ा वर्ग को 3 और वैश्य समाज को सिर्फ 1 पद दिया गया।
‘सामाजिक न्याय‘ या ‘वोट बैंक का गणित‘?
कांग्रेस का यह कदम बिहार की जटिल जातीय राजनीति को समझने में नाकामी का प्रतीक है। एक तरफ, राजेश राम की नियुक्ति से पार्टी दलित वोटों को लुभाना चाहती है, वहीं सवर्णों को 35% पद देकर पारंपरिक वोट बैंक को संतुष्ट करने की कोशिश की गई है। पर सवाल यह है: “क्या यह फॉर्मूला 2025 के विधानसभा चुनाव में काम आएगा?”
जातीय समीकरण की गहराई से पड़ताल
वर्ग | संख्या |
---|---|
सवर्ण | 14 |
ओबीसी | 10 |
अल्पसंख्यक | 7 |
दलित | 5 |
अति पिछड़ा | 3 |
वैश्य | 1 |
कुल | 40 |