बिहार की राजनीति एक बार फिर पारिवारिक विरासत की सरहद लांघ कर भावनाओं के समंदर में डूब गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति कुमार पारस का ताजा बयान न सिर्फ राजनीतिक हलकों में सनसनी फैला गया है, बल्कि यह स्पष्ट संकेत है कि पासवान परिवार में ‘विरासत का संग्राम’ अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है।
हाजीपुर में एक सार्वजनिक मंच से बोलते हुए पारस ने कहा कि “जब दल बंटा तो दिल भी बंट गया, अब घर भी बंटना चाहिए – शहरबनी से लेकर दिल्ली तक!” यह महज एक वाक्य नहीं, बल्कि एक भावनात्मक विस्फोट था, जो पारिवारिक संपत्ति विवाद के बीच से उठता हुआ सियासी मंच पर धमाके की तरह गूंजा।
राजनीति की दीवार से टकराया घर का मामला
यह विवाद सिर्फ दीवारों और जमीन का नहीं है। पारस ने यह स्पष्ट किया कि यह लड़ाई उस ‘संयुक्त परिवार’ की पहचान और अधिकारों की है, जिसमें तीन भाई वर्षों से साथ रह रहे हैं। उन्होंने कहा, “50 वर्षों से हमारी बड़ी भाभी यानी पासवान जी की पत्नी उसी घर में रह रही हैं। हम उन्हें बड़ी मां मानते हैं। लेकिन अब जब दल टूट गया, तो दिल भी टूट गया। बंटवारा अब ज़रूरी है—दिल्ली, पटना, खगड़िया और शहरबनी, जहां-जहां संपत्ति है, सबका हिस्सा तय हो।”
FIR और ‘अंगूठा’ की राजनीति
बयान के सबसे चौंकाने वाले हिस्से में पारस ने FIR का ज़िक्र करते हुए कहा कि “भाभी जी पढ़ी-लिखी नहीं हैं। FIR में सिर्फ दस्तखत नहीं, बल्कि ‘दस्तक’ कराके भेजा गया है। अंगूठा लगवाया गया है। यह सब जांच का विषय है।”
यह इशारा स्पष्ट रूप से यह बताता है कि पारिवारिक विवाद अब प्रशासनिक और कानूनी दायरे में खिंच चुका है। पारस ने यह भी कहा कि आने वाले “10 से 15 दिनों में सब कुछ सामने आ जाएगा।”
पारस का यह बयान उस दबाव का संकेत है, जो पिछले कुछ समय से उनके सिर पर मंडरा रहा था। रामविलास पासवान के निधन के बाद जिस तरह से लोक जनशक्ति पार्टी दो गुटों में बंटी—एक चिराग पासवान के नेतृत्व में और दूसरा पशुपति पारस के नेतृत्व में—वही टूट अब घर की चौखट पर दस्तक दे रही है।
पारस के इस बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि राजनीतिक मतभेद अब निजी जिंदगी में सेंध लगा चुके हैं। उन्होंने कहा कि “दल तो कभी जुड़ सकता है, लेकिन दिल कभी नहीं जुड़ता।”