Prashant Kishor Congress: बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज है और इस बार चर्चा के केंद्र में हैं चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर। हाल के दिनों में कांग्रेस और आरजेडी के बीच बढ़ती बयानबाजी, आपसी आरोप-प्रत्यारोप और तालमेल पर उठते सवालों के बीच यह बहस जोर पकड़ रही है कि क्या प्रशांत किशोर की नजदीकियां कांग्रेस के साथ नए राजनीतिक समीकरण की ओर इशारा कर रही हैं। इसी सवाल के इर्द-गिर्द बिहार की सियासत एक नए मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है।
विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद आरजेडी और कांग्रेस के रिश्तों में आई खटास अब खुलकर सामने आने लगी है। जिस गठबंधन ने चुनाव से पहले एक-दूसरे का हाथ थामकर भाजपा को सत्ता से रोकने की रणनीति बनाई थी, वही गठबंधन अब परिणामों के बाद एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालता दिख रहा है। 2020 के चुनाव आरजेडी को सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद 2025 में भी सत्ता से दूर रहना पड़ा, वहीं कांग्रेस 60 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद महज छह सीटों पर सिमट गई। इस नतीजे ने कांग्रेस के भीतर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या आरजेडी के साथ गठबंधन से उसे कोई वास्तविक राजनीतिक लाभ मिला।
चुनाव के बाद कांग्रेस नेताओं के बयान इस असंतोष को और गहरा करते हैं। प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेता तक की हार ने पार्टी को आत्ममंथन के दौर में धकेल दिया है। कांग्रेस नेताओं का यह कहना कि आरजेडी के साथ तालमेल सिर्फ चुनाव तक सीमित था, इस बात का संकेत है कि गठबंधन की नींव पहले से ही कमजोर थी। मधुबनी की बैठक में टिकट वितरण को लेकर हुई झड़पों और अंदरूनी कलह की खबरों ने इस दूरी को और उजागर कर दिया।
इसी सियासी माहौल में प्रशांत किशोर का नाम बार-बार सामने आ रहा है। कांग्रेस नेतृत्व के साथ उनकी मुलाकातों और दिल्ली में लंबे प्रवास की चर्चाओं ने अटकलों को हवा दी है। यह सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस अब आरजेडी के बजाय प्रशांत किशोर के साथ किसी नए प्रयोग की ओर बढ़ रही है। हालांकि जानकारों का मानना है कि कांग्रेस और आरजेडी के बीच बढ़ी दूरी की वजह प्रशांत किशोर नहीं, बल्कि दोनों दलों के अपने-अपने राजनीतिक हित और चुनावी अनुभव हैं।
प्रशांत किशोर के लिए भी यह दौर आत्मविश्लेषण का है। बिहार में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला उनके लिए अपेक्षित नतीजे नहीं ला सका। तमाम बड़े वादों और आक्रामक एजेंडे के बावजूद उनकी पार्टी खाता तक नहीं खोल पाई। खुद प्रशांत किशोर ने इसके लिए नीतीश कुमार की सामाजिक और आर्थिक योजनाओं को बड़ा कारण बताया था, जिसने उनके राजनीतिक प्रयोग की धार को कुंद कर दिया। इसके बाद यह साफ हो गया कि बिहार की राजनीति में आगे बढ़ने के लिए उन्हें किसी बड़े राजनीतिक मंच या मजबूत संगठनात्मक समर्थन की जरूरत होगी।
कांग्रेस के लिए भी स्थिति आसान नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के बावजूद बिहार में उसका संगठन कमजोर पड़ा है। ऐसे में प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार के साथ संभावित तालमेल कांग्रेस को नई ऊर्जा दे सकता है। दूसरी ओर, आरजेडी को भी यह एहसास है कि सिर्फ यादव और मुस्लिम वोट बैंक के सहारे लंबे समय तक सत्ता की राजनीति करना चुनौतीपूर्ण होगा। यही वजह है कि दोनों दलों के बीच असहजता बढ़ती दिख रही है।
फिलहाल इतना तय है कि कांग्रेस और आरजेडी के रिश्तों में आई खटास ने राजनीतिक शून्य पैदा किया है और इस शून्य में प्रशांत किशोर की भूमिका को लेकर कयास तेज हो गए हैं। यह सियासत का वही मोड़ है, जहां हर मुलाकात, हर बयान और हर रणनीति के दूरगामी मायने निकाले जा रहे हैं।






















