भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में जातीय हिंसा की भयावह आग के बाद अब राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया है। गृह मंत्री ने इस फैसले को सदन के सामने पेश करते हुए अनुमोदन की अपील की, लेकिन इस मुद्दे ने संसद में तीखी बहस को जन्म दे दिया। लोकसभा ने बुधवार (2 अप्रैल) देर रात मणिपुर में लागू राष्ट्रपति शासन को अनुमोदित करने वाले विधिक प्रस्ताव को पारित कर दिया। हिंसा प्रभावित मणिपुर में 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लगाया गया था। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, दो महीने के भीतर राष्ट्रपति शासन की पुष्टि हेतु यह विधिक संकल्प केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लोकसभा में पेश किया गया।
जातीय संघर्ष से राष्ट्रपति शासन तक: एक नजर
मणिपुर में हाई कोर्ट के एक फैसले के बाद दो समुदायों के बीच आरक्षण को लेकर विवाद छिड़ा, जिसने जातीय हिंसा का रूप ले लिया। इस हिंसा को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है।
- सरकार का पक्ष: गृह मंत्री का कहना है कि यह न दंगा था, न आतंकवाद, बल्कि एक न्यायिक आदेश की अलग-अलग व्याख्या ने इसे भड़काया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अप्रैल-मई में हुई हिंसा के बाद अब चार महीनों से हालात शांत हैं।
- विपक्ष का सवाल: विपक्ष ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार मणिपुर में शांति बहाल करने में विफल रही, जिससे राष्ट्रपति शासन लगाने की नौबत आई।
मणिपुर में हिंसा का इतिहास: क्या यह पहली बार हुआ?
मणिपुर में जातीय संघर्ष कोई नया नहीं है। गृह मंत्री ने 1993 में नागा-कुकी संघर्ष, 1997-98 में कुकी-पायते संघर्ष और 1993 में मैतेई-पंगल संघर्ष का हवाला देते हुए बताया कि इससे पहले भी लंबे समय तक हिंसा चली थी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे।
- 1993 नागा-कुकी संघर्ष: 5 साल तक चला, 750 मौतें।
- 1997-98 कुकी-पायते संघर्ष: 352 मौतें, 5000 घर जलाए गए।
- 1993 मैतेई-पंगल संघर्ष: 100 से ज्यादा मौतें, 6 महीने तक हिंसा।
गृह मंत्री ने कहा कि इन घटनाओं के दौरान केंद्र सरकारें निष्क्रिय रहीं, लेकिन इस बार तत्काल कार्रवाई की गई।
2017 से 2023: मणिपुर में शांति के छह साल?
गृह मंत्री ने दावा किया कि 2017 में भाजपा सरकार बनने के बाद मणिपुर में हालात सुधरे।
- 2012-17: हर साल 212 दिन बंद, 1000 से अधिक एनकाउंटर।
- 2017-23: एक भी दिन बंद नहीं, कोई हिंसा नहीं।
लेकिन मई 2023 में हाई कोर्ट के फैसले के बाद दो समुदायों के बीच तनाव बढ़ गया, जिससे हिंसा भड़क गई। सरकार ने तुरंत वायुसेना के विमानों से सुरक्षाबलों की तैनाती की, लेकिन विरोधियों का आरोप है कि स्थिति को नजरअंदाज किया गया।
राष्ट्रपति शासन: क्या यही समाधान है?
राष्ट्रपति शासन के बाद सरकार का दावा है कि दोनों समुदायों के साथ अलग-अलग बैठकें हो चुकी हैं। सभी विस्थापितों को शिविरों में जरूरी सुविधाएं मिल रही हैं। शिक्षा के लिए ऑनलाइन और कैंपों में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था की गई है। शांति बहाली और पुनर्वास पर काम हो रहा है। लेकिन विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या राष्ट्रपति शासन से मणिपुर को स्थायी शांति मिलेगी, या यह केवल राजनीतिक नियंत्रण का तरीका है? गृह मंत्री ने अपील की कि सभी दल राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रपति शासन के अनुमोदन का समर्थन करें ताकि मणिपुर में शांति बहाल हो सके।