कांग्रेस में एक बार फिर इंदिरा गांधी के दौर की वापसी की आहट सुनाई देने लगी है। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने शुक्रवार को बिहार के नवनियुक्त जिलाध्यक्षों की बैठक में जो संकेत दिए, वे कांग्रेस की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर राहुल ने जो टिकट बंटवारे का नया फॉर्मूला पेश किया है, वह न सिर्फ ज़मीनी कार्यकर्ताओं को मजबूती देगा, बल्कि केंद्र में सत्ता के केंद्रीकरण पर भी रोक लगाने की कोशिश मानी जा रही है।
क्या है नया फॉर्मूला?
- जिलाध्यक्षों को टिकट चयन में मिलेगा अहम रोल
- प्रत्याशियों के चयन में स्थानीय नेतृत्व की राय प्राथमिक
- सीईसी की बैठक में जिलाध्यक्ष होंगे शामिल
- हर महीने जिलास्तरीय बैठक अनिवार्य
- प्रत्याशी को स्थानीय कार्यक्रमों में भाग लेना होगा जरूरी
- छह महीने में प्रखंड, बूथ और वार्ड स्तर तक कमेटियों का गठन
अगर ये दिशा-निर्देश तय समय में लागू नहीं होते हैं, तो जिलाध्यक्ष को पद से हटाने की चेतावनी भी दी गई है।
यह बदलाव सिर्फ संगठनात्मक सुधार नहीं है, बल्कि कांग्रेस की आंतरिक राजनीति का ‘पावर डीसेंट्रलाइजेशन’ भी है। लंबे समय से आलाकमान पर निर्भर रही पार्टी अब स्थानीय नेतृत्व को सशक्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
2025 का बिहार चुनाव – कांग्रेस की अग्निपरीक्षा
बिहार का चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की पुनर्परिभाषा भी है। राहुल गांधी के इस फैसले से पार्टी की ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा तक की रणनीति में व्यापक बदलाव की उम्मीद है।