बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 की सियासी बिसात बिछ चुकी है, और इस बार कांग्रेस ने अपने खेल के सारे मोहरे बदल दिए हैं। बदला गया प्रदेश प्रभारी, बदले गए प्रदेश अध्यक्ष, और अब 40 जिलाध्यक्षों को भी हटाकर नई टीम बनाई गई। इस नए सेटअप के साथ राहुल गांधी मैदान में उतरने को तैयार हैं।
7 अप्रैल को राहुल गांधी पटना पहुंच रहे हैं, जहां वे श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल (SKM हॉल) में होने वाले संविधान सुरक्षा सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। यह दौरा कई मायनों में खास होगा, क्योंकि यह इस साल राहुल गांधी का बिहार का तीसरा दौरा होगा। कांग्रेस इसे चुनाव से पहले का “शंखनाद” मान रही है।
राहुल बनाम मोदी: 2025 की लड़ाई की शुरुआत?
बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस इस बार कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती। यही कारण है कि राहुल गांधी का यह दौरा सिर्फ एक सम्मेलन नहीं, बल्कि सियासी माहौल को गर्म करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
सूत्रों की मानें तो राहुल गांधी इस दिन कन्हैया कुमार की ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा में भी शामिल हो सकते हैं। कन्हैया बेगूसराय से हैं और उनकी यात्रा उसी दिन बेगूसराय में होगी। राहुल पहले बेगूसराय जाकर इस यात्रा का हिस्सा बन सकते हैं और फिर पटना के कार्यक्रम में भाग लेंगे। इससे संकेत मिलता है कि कांग्रेस युवा और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है।
राजद-कांग्रेस रिश्ते: क्या तेजस्वी और राहुल एक मंच पर आएंगे?
बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि क्या तेजस्वी यादव इस बार राहुल गांधी के साथ मंच साझा करेंगे? हाल ही में कांग्रेस और राजद के रिश्तों में खटास की खबरें आई थीं, लेकिन दिल्ली में हुई एक बैठक में कांग्रेस ने साफ कर दिया कि वह राजद के साथ गठबंधन में ही चुनाव लड़ेगी।
हालांकि, अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि 7 अप्रैल को तेजस्वी यादव इस सम्मेलन में शामिल होंगे या नहीं। अगर दोनों नेता एक मंच पर आते हैं, तो यह बिहार की राजनीति के लिए बड़ा संदेश होगा। लेकिन अगर तेजस्वी नदारद रहते हैं, तो गठबंधन के भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो जाएंगी।
बिहार में कांग्रेस की नई रणनीति: क्या बदल गया?
- नई टीम: कांग्रेस ने पूरे राज्य में सांगठनिक बदलाव किए हैं। 40 जिलाध्यक्ष बदले गए हैं और अब नए अध्यक्षों को चुनावी जिम्मेदारी दी गई है।
- राहुल की सक्रियता: इस साल राहुल गांधी का बिहार का यह तीसरा दौरा है, जिससे कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि वह इस बार बैकफुट पर नहीं रहेगी।
- युवा वोटर्स पर फोकस: कन्हैया कुमार की यात्रा में राहुल की संभावित भागीदारी दिखाती है कि कांग्रेस बेरोजगारी और युवाओं के मुद्दे को चुनावी नैरेटिव बनाएगी।
- संविधान और सामाजिक न्याय: संविधान सुरक्षा सम्मेलन के जरिए कांग्रेस दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वोटरों को साधने की कोशिश कर रही है।
क्या कांग्रेस बिहार में वापसी कर पाएगी?
2015 में कांग्रेस को 27 सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन 2020 में कांग्रेस महज 19 सीटों पर सिमट गई थी। इस बार कांग्रेस बिहार की राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए आक्रामक रणनीति अपनाने की कोशिश कर रही है।
राहुल गांधी की यह यात्रा कांग्रेस के लिए कितनी फायदेमंद होगी, यह तो चुनाव के नतीजे तय करेंगे। लेकिन इतना साफ है कि 7 अप्रैल को बिहार की सियासत में हलचल तेज होने वाली है।