Rajesh Verma Vande Mataram speech: लोकसभा में खगड़िया से लोजपा (रामविलास) के सांसद राजेश वर्मा का विस्तृत और भावनात्मक वक्तव्य सोमवार को चर्चा का मुख्य विषय बन गया। वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर बोलते हुए उन्होंने न केवल इस राष्ट्रीय गीत की ऐतिहासिक भूमिका और उसके प्रेरक स्वरूप को रेखांकित किया, बल्कि आज की राजनीति में बढ़ती तुष्टीकरण प्रवृत्ति पर भी तीखा वार किया। उनका भाषण राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक विरासत, स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और वर्तमान राजनीतिक हालात को जोड़ता हुआ नजर आया।
राजेश वर्मा ने अपने संबोधन की शुरुआत खगड़िया, लोजपा रामविलास और चिराग पासवान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए की। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम मात्र दो शब्द नहीं, बल्कि वह मंत्र है जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान करोड़ों भारतीयों के भीतर अदम्य साहस और अटूट आत्मविश्वास भरा। वर्मा के अनुसार जहां-जहां वंदे मातरम का उद्घोष गूंजा, वहां-वहां आजादी की लौ और तेज हुई। उन्होंने इसे वही ज्वाला बताया जिसने बेड़ियां तोड़ीं और भारत को एकता के सूत्र में पिरोया।
अपने वक्तव्य में सांसद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनडीए सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह सरकार केवल वर्तमान और भविष्य के विकास पर ध्यान नहीं देती, बल्कि देश के गौरवशाली इतिहास को उत्सव की तरह मनाने में भी विश्वास रखती है। उन्होंने राम मंदिर के निर्माण, नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना और वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने के राष्ट्रीय आयोजन का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार विरासत और विकास, दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ रही है।
सांसद वर्मा ने पटना के ऐतिहासिक शहीद स्मारक का उल्लेख करते हुए 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बलिदान देने वाले सात युवाओं की कहानी भी सदन में रखी। उन्होंने बताया कि गोली लगने के बावजूद उन वीरों ने तिरंगे को जमीन पर नहीं गिरने दिया और अंतिम सांस तक उनके होंठों पर वंदे मातरम ही था। उन्होंने कहा कि यही उद्घोष आज भी बिहार के मजदूरों, बिहार रेजीमेंट के सैनिकों और देश की मिट्टी से जुड़े हर भारतीय की आत्मा में गूंजता है।
वर्मा के भाषण का सबसे तीखा हिस्सा उस समय सामने आया जब उन्होंने 1937 में वंदे मातरम को राजनीतिक दबाव और तुष्टीकरण की राजनीति के चलते खंडित करने का आरोप कांग्रेस नेतृत्व पर लगाया। उन्होंने कहा कि भौगोलिक विभाजन 1947 में हुआ, लेकिन मानसिक विभाजन 1937 में ही हो गया था, जब वोट बैंक की राजनीति के नाम पर गीत के कई छंद हटा दिए गए। सांसद ने तर्क दिया कि जिस गीत ने करोड़ों लोगों को आजादी की लड़ाई में एकजुट किया, उसे धार्मिक आधार पर विभाजित करना देश की आत्मा से खिलवाड़ था।
वर्मा ने बंगाल की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वही बंगाल जिसने वंदे मातरम, रवींद्रनाथ टैगोर, नेता सुभाष चंद्र बोस और स्वामी विवेकानंद को जन्म दिया, आज तुष्टिकरण की राजनीति से ग्रस्त दिखाई देता है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में वंदे मातरम बोलने वाले को सांप्रदायिक कहा जाता है, जबकि घुसपैठियों को संरक्षण दिया जाता है।
अपने वक्तव्य के अंतिम हिस्से में वर्मा ने बिहार चुनाव के संदर्भ से वर्तमान राजनीति का संदेश देते हुए कहा कि अब देश तुष्टीकरण नहीं, बल्कि विकास और राष्ट्रवाद को चुन रहा है। उन्होंने प्रतिपक्ष पर यह कहकर भी निशाना साधा कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर भी नेता प्रतिपक्ष सदन में मौजूद नहीं रहे। वर्मा ने कहा कि लड़ाई सत्ता की नहीं, बल्कि सत्य और स्वाभिमान की है। अंत में उनका समापन उद्घोष पूरे सदन में गूंजा- वंदे मातरम।
















