पटना के मोइन-उल-हक स्टेडियम में खेला गया रणजी ट्रॉफी (Ranji Trophy 2025-26) प्लेट ग्रुप फाइनल बिहार क्रिकेट के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज हो गया। यह मुकाबला सिर्फ मणिपुर पर बड़ी जीत का आंकड़ा नहीं था, बल्कि उस लंबे संघर्ष का जवाब था जिससे गुजरकर बिहार क्रिकेट एक बार फिर सम्मान और पहचान की ओर लौटा है। 568 रनों के विशाल अंतर से मिली जीत ने यह साफ कर दिया कि बिहार अब अतीत की कमजोरियों से बाहर निकल चुका है और एलीट ग्रुप में वापसी के लिए पूरी तरह तैयार है।
मैच की शुरुआत से ही बिहार की मंशा आक्रामक और स्पष्ट दिखी। कप्तान साकिबुल गनी ने नेतृत्व की जिम्मेदारी को पूरी गंभीरता से निभाते हुए पहली पारी में 155 गेंदों पर 108 रनों की सधी हुई लेकिन प्रभावशाली शतकीय पारी खेली। उनका यह शतक टीम के लिए सिर्फ रन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की नींव साबित हुआ। बिपिन सौरभ के शतक और आकाश राज व सूरज कश्यप के अर्धशतकों ने बिहार को 522 रनों के मजबूत स्कोर तक पहुंचाया, जिससे मैच का रुख शुरुआती दौर में ही बिहार के पक्ष में चला गया।
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मणिपुर की टीम दबाव में नजर आई और पहली पारी में 264 रनों पर सिमट गई। बिहार की गेंदबाज़ी में अनुशासन और निरंतरता साफ दिखाई दी। सूरज कश्यप, प्रशांत सिंह और हिमांशु सिंह ने सही लाइन-लेंथ के साथ बल्लेबाज़ों को खुलकर खेलने का मौका नहीं दिया। पहली पारी की 258 रनों की बढ़त ने बिहार को रणनीतिक बढ़त दिला दी, लेकिन टीम ने यहीं रुकने का फैसला नहीं किया।
दूसरी पारी में बिहार का रवैया और भी आक्रामक हो गया। 505 रन पर पारी घोषित करना इस बात का संकेत था कि टीम सिर्फ जीत नहीं, बल्कि विपक्ष को मानसिक रूप से तोड़ देना चाहती थी। पियूष सिंह का नाबाद दोहरा शतक इस मुकाबले की सबसे बड़ी उपलब्धि बनकर उभरा। उनके साथ बिपिन सौरभ, खालिद आलम और रघुवेंद्र प्रताप सिंह के तेज़ अर्धशतकों ने स्कोरबोर्ड को रफ्तार दी और मणिपुर के सामने 764 रनों का पहाड़ जैसा लक्ष्य खड़ा कर दिया।
अंतिम पारी में मणिपुर की टीम 195 रनों पर ढेर हो गई और बिहार ने रणजी ट्रॉफी प्लेट ग्रुप फाइनल में रिकॉर्ड अंतर से जीत दर्ज की। यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि इससे पहले बिहार लगातार दो रणजी सीज़न में एक भी मैच जीतने में नाकाम रहा था। आलोचनाओं, संसाधनों की कमी और निराशा के दौर से गुजरने के बाद इस खिताब ने यह साबित कर दिया कि टीम ने अपनी गलतियों से सीखा और खुद को फिर से संगठित किया।
प्लेट ग्रुप में पांच मैचों के सफर में दो जीत और तीन ड्रॉ के साथ फाइनल तक पहुंचना और फिर इतनी बड़ी जीत हासिल करना बिहार क्रिकेट के पुनर्जागरण की कहानी कहता है। अब 2026-27 सीज़न में एलीट ग्रुप में वापसी के साथ चुनौतियां कहीं अधिक कठिन होंगी, जहां देश की शीर्ष टीमों के खिलाफ निरंतरता और गहराई की असली परीक्षा होगी। हालांकि मोइन-उल-हक स्टेडियम में दिखा आत्मविश्वास और टीम का संतुलन यह संकेत देता है कि बिहार क्रिकेट अब सिर्फ भागीदारी की नहीं, बल्कि मुकाबला जीतने की मानसिकता के साथ मैदान में उतरने वाली टीम बन चुका है।





















