नरकटियागंज के नगर व ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं ने बीते दिन गुरुवार को ऋषि पंचमी पर्व मनाया। महिलाओं ने व्रत रखा। दोपहर में सभी व्रती महिलाएं 101 चिडडी से दातून किया और उतना उसके पते से स्नान किया। संध्या में कर्मी के साग व चावल का सेवन किया।
मंदिर के पुजारी ने सुनाई कथा
देवी स्थान मन्दिर के पुजारी व कथा वाचक मुन्ना पंडी़त ने कथा का पाठ किया। उन्होंने बताया कि विदर्भ देश में उत्तंक राज्य में एक ब्राहम्ण रहता था उसकी पत्नी बडी पविव्रता थी जिसका नाम शुशिला था उस व्राहम्ण की एक पुत्री व एक पुत्र था विवाह योग्य होने पर उसने समान कुशलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया । दैवयोग से कुछ दिनों के बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राहम्ण दम्पति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बना कर रहने लगे। एक दिन ब्राहम्ण कि कन्या सो रही थी उसका शरीर कीडे़ से भर गए। कन्या ने सारी बात अपनी मां को बताई। मां अपने पति को बतया। कहा कि ये प्राणनाथ मेरी साघ्वी कन्या का यह गति होने का क्या कारण है। उत्तंक ने समाधी लगाकर इस घटना का पता लगाया। तो पता चला कि पूर्व जन्म में यह कन्या ब्राहम्ण थी इसने रजस्वला होते हुये वर्तन छू दिये थे। इस जन्म में भी इसने लोगों को देखा देखी ऋषि पंचमी व्रत नहीं किया । इस लिए इसके शरीर पर में कीडे़ पडे़ ।
पुजारी ने बताई धर्म शास्त्रों की मान्यता
मंदिर पुजारी व कथा वाचक मुन्ना पंडी़त ने बताया कि धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी ,दूसरे दिन ब्रहाघातिनी तथा तिसरे दिन धोबिन के सामान अपवित्र होती है। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्व होती है। यदि शुद्व मन से आप भी ऋषि पंचमी व्रत करे तो इसके सारे दुख दूर हो जायेगें और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त होगा । पिता के कहने पर ब्राहम्ण की पुत्री ने यह व्रत किया । व्रत के प्रभाव से उसके सारे दुखों से मुक्त हो गई। उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला । इस लिए सभी स्त्रीयों को यह पर्व महिलाएं करती हैं।




















