बिहार की सियासत (RJD Politics) में एक बड़ा अध्याय उस वक्त जुड़ गया, जब राष्ट्रीय जनता दल ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष घोषित कर दिया। होटल मौर्य में हुई RJD की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में यह प्रस्ताव भोला यादव ने रखा, जिस पर मौजूद नेताओं ने सर्वसम्मति से मुहर लगा दी। मंच पर लालू प्रसाद, राबड़ी देवी, मीसा भारती, संजय यादव सहित पार्टी के तमाम दिग्गजों की मौजूदगी ने इस फैसले को औपचारिक रूप से ऐतिहासिक बना दिया, लेकिन इसके तुरंत बाद उठे सवालों ने इस फैसले को सियासी बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।
तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने को पार्टी नेतृत्व की पीढ़ीगत बदलाव की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। लालू प्रसाद की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब औपचारिक रूप से तेजस्वी के कंधों पर है। RJD के भीतर इसे 2025-26 की चुनावी तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है, जहां तेजस्वी को राष्ट्रीय स्तर पर निर्णायक भूमिका में लाने की कोशिश मानी जा रही है।
हालांकि इस फैसले ने पार्टी के भीतर ही एक असहज बहस को जन्म दे दिया है। तेजस्वी यादव की बहन रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इस ताजपोशी पर सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने अपने पोस्ट में इसे “सियासत के शिखर-पुरुष की गौरवशाली पारी का एक तरह से पटाक्षेप” बताते हुए इशारों में पार्टी के मौजूदा नेतृत्व तंत्र पर हमला किया। उनके शब्दों में ठकुरसुहाती करने वालों और “गिरोह-ए-घुसपैठ” के हाथों कथित रूप से एक “कठपुतली बने शहजादा” की ताजपोशी का जिक्र, RJD के अंदर चल रही खींचतान को सार्वजनिक मंच पर ले आया।

रोहिणी आचार्य यहीं नहीं रुकीं। इससे पहले किए गए एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लालूवाद की परिभाषा को विस्तार से सामने रखते हुए कहा कि जो वास्तव में लालू प्रसाद की विचारधारा को मानता है, जो हाशिए पर खड़ी आबादी और वंचित वर्गों के हक के लिए खड़ी की गई पार्टी के लिए निःस्वार्थ संघर्ष करता रहा है, वह पार्टी की मौजूदा हालत के लिए जिम्मेदार लोगों से सवाल जरूर करेगा। उनके मुताबिक सामाजिक और आर्थिक न्याय की जिस विरासत को लालू प्रसाद ने खड़ा किया, आज उसी के नाम पर पार्टी के भीतर चुप्पी और समझौते का माहौल बन गया है।
अपने बयान में रोहिणी आचार्य ने मौजूदा हालात को कड़वी और चिंताजनक सच्चाई बताते हुए आरोप लगाया कि जनता के हक-हकूक की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी की असली कमान अब ऐसे लोगों के हाथों में चली गई है, जिन्हें लालूवाद को कमजोर करने के मकसद से आगे बढ़ाया गया। उनके शब्दों में, ऐसे तत्व पार्टी के भीतर कब्जा जमाकर अपने एजेंडे में काफी हद तक सफल होते भी दिख रहे हैं।
उन्होंने नेतृत्व पर सवालों से बचने, जवाब देने से कतराने और तार्किक व तथ्यात्मक बहस की जगह भ्रम फैलाने का आरोप भी लगाया। उनका कहना है कि जो लोग लालूवाद और पार्टी हित की बात करते हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है। रोहिणी आचार्य के मुताबिक यदि नेतृत्व इन सवालों पर चुप्पी साधे रखता है, तो उस पर साजिश करने वाले गिरोह के साथ मिलीभगत का आरोप अपने आप मजबूत हो जाता है।






















