भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आर.के. सिंह के निलंबन (RK Singh Suspension Row) के बाद बिहार की राजनीति में एक नई हलचल पैदा हो गई है। सिंह ने खुलकर कहा है कि पार्टी ने उन्हें जिन ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के आधार पर नोटिस भेजा, वही सबसे बड़ा सवाल है। उनके अनुसार न तो नोटिस में इन गतिविधियों का स्पष्ट वर्णन किया गया और न ही पार्टी ने उनसे जुड़े आरोपों पर कोई तर्कसंगत जवाब दिया।
सिंह ने दावा किया कि उन्होंने पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को स्वयं इस्तीफा भेज दिया और इसके साथ ही बिहार भाजपा से यह पूछने का अधिकार भी मांगा कि आखिर उनका अपराध क्या है। उन्होंने कहा कि उनका एकमात्र बयान यह था कि भ्रष्ट पृष्ठभूमि या आपराधिक छवि वाले लोगों को टिकट नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे पार्टी की साख कमजोर होती है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या साफ-सुथरी राजनीति की वकालत करना पार्टी विरोधी गतिविधि माना जाएगा? सिंह के अनुसार यदि टिकट वितरित करते समय अपराधी छवि वाले लोगों को प्राथमिकता दी जाती है, तो यह न केवल पार्टी की छवि को धूमिल करता है, बल्कि राष्ट्रीय और जनहित—दोनों के खिलाफ जाता है।
आर.के. सिंह का बयान इस बात को उजागर करता है कि भाजपा के भीतर टिकट वितरण को लेकर असंतोष सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर नहीं है, बल्कि यह संगठनात्मक नैतिकता और सिद्धांतों से भी जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि उन्होंने पार्टी के व्यापक हित की बात की, पर यदि पार्टी इसे अपराध मानती है तो यह स्थिति चिंताजनक है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे माहौल में रहने का क्या लाभ, जहां अपराधी बैकग्राउंड पर सवाल उठाने भर से लोग परेशान हो जाएं।






















