Shambhu Girls Hostel case: पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में नीट की छात्रा के साथ कथित दुष्कर्म का मामला बिहार की कानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा प्रणाली पर सवाल खड़ा कर चुका है। यह घटना न केवल पीड़िता के परिवार के लिए बल्कि पूरे राज्य की न्याय प्रणाली और संवेदनशील अपराधों के प्रति प्रशासनिक जवाबदेही के लिए चुनौती बन गई है। अब यह मामला पटना उच्च न्यायालय तक पहुंच गया है, जहां वरिष्ठ अधिवक्ता मणिभूषण प्रताप सेंगर ने जांच की निष्पक्षता पर गंभीर आपत्ति जताते हुए उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच की मांग की है।
अधिवक्ता सेंगर का कहना है कि प्रारंभिक स्तर पर पुलिस जांच में कई बड़ी चूकें हुई हैं। घटनास्थल से जुड़े साक्ष्यों का संकलन सही तरीके से नहीं हुआ और नियमों का पालन नहीं किया गया। इसी कारण पीड़ित परिवार का स्थानीय पुलिस और राज्य जांच तंत्र पर भरोसा खत्म हो चुका है। उन्होंने हाईकोर्ट में आवेदन में यह भी कहा कि यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि महिला सुरक्षा और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों से जुड़ा है। यदि जांच निष्पक्ष नहीं होगी, तो इससे न्याय प्रक्रिया और आम जनता के विश्वास पर असर पड़ेगा।
अधिवक्ता ने पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को आवेदन भेजते हुए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से मामले की जांच कराने की मांग की है। उनका तर्क है कि केवल एक स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी ही इस संवेदनशील मामले की वास्तविक सच्चाई सामने ला सकती है और पीड़िता को न्याय दिला सकती है। आवेदन में वैकल्पिक रूप से यह भी सुझाव दिया गया कि यदि किसी कारणवश सीबीआई जांच संभव न हो, तो किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग का गठन किया जाए।
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अधिवक्ता ने ईमेल के माध्यम से बिहार के मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, राज्य के मुख्य सचिव, डीजीपी और पटना के एसएसपी को भी सूचित किया है। यह कदम यह दर्शाता है कि पीड़ित परिवार न्याय की अपेक्षा में कितने गंभीर हैं और राज्य प्रशासन को जवाबदेह ठहराने के लिए सभी संवैधानिक साधनों का उपयोग किया जा रहा है।
राज्य में पहले भी महिलाओं के खिलाफ अपराधों और हॉस्टल सुरक्षा मामलों में विवादित परिस्थितियों के कारण प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में शंभू गर्ल्स हॉस्टल कांड एक निर्णायक मोड़ बनकर उभरा है। सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार चैनलों पर इस मामले को लेकर चर्चा लगातार बढ़ रही है, जिससे जनता में यह उम्मीद भी जगी है कि न्याय प्रक्रिया में किसी प्रकार की देरी या दबाव नहीं आने दिया जाएगा।
पटना हाईकोर्ट का फैसला राज्य की महिला सुरक्षा व्यवस्था और कानून प्रवर्तन प्रणाली की प्रभावशीलता पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। यदि सीबीआई जांच की मांग मानी जाती है, तो बिहार में संवेदनशील अपराधों में केंद्रीय एजेंसी की भूमिका और महत्त्व और बढ़ जाएगा। वहीं, यदि न्यायिक आयोग बनाया जाता है, तो यह राज्य सरकार के प्रति जनता का विश्वास बहाल करने का एक कदम माना जाएगा।






















