Shravan Kumar NDA Chief Whip: बिहार की राजनीति में एक बार फिर नीतीश कुमार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संगठन और सत्ता के संतुलन में भरोसेमंद साथियों की भूमिका उनके लिए सबसे अहम है। ग्रामीण विकास मंत्री और जनता दल यूनाईटेड के वरिष्ठ नेता श्रवण कुमार को विधानसभा में सत्तारूढ़ एनडीए का मुख्य सचेतक नियुक्त किया जाना केवल एक पद की घोषणा नहीं, बल्कि तीन दशकों से अधिक पुरानी राजनीतिक साझेदारी पर विश्वास की औपचारिक मुहर है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के अनुभवी नेता विनोद नारायण झा को उप मुख्य सचेतक बनाकर गठबंधन के भीतर संतुलन का संदेश भी दिया गया है।
श्रवण कुमार का नाम बिहार की राजनीति में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनका राजनीतिक सफर संघर्ष, पराजय और धैर्य से होकर गुजरा है। मौजूदा नियुक्ति को अगर उनके जीवन की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि यह जिम्मेदारी उन्हें अचानक नहीं मिली, बल्कि दशकों की राजनीतिक तपस्या का परिणाम है। श्रवण कुमार की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 1974 के ऐतिहासिक जेपी आंदोलन से हुई थी। उसी आंदोलन में वे नीतीश कुमार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सत्ता के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। आपातकाल के दौर में जब वे हजारीबाग जेल में बंद थे, तब जननायक कर्पूरी ठाकुर के सानिध्य ने उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को गहराई दी।
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कर्पूरी ठाकुर का प्रभाव श्रवण कुमार के पूरे राजनीतिक जीवन में दिखाई देता है। 1985 में नालंदा विधानसभा उपचुनाव में लोकदल के उम्मीदवार के तौर पर उनका पहला चुनावी अनुभव बेहद कठिन रहा। उस समय नालंदा सीट से कई दिग्गज दावेदार थे, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने चौंकाने वाला फैसला लेते हुए श्रवण कुमार को टिकट दिया। चुनाव परिणाम उनके पक्ष में नहीं आया और उन्हें महज 2400 वोट मिले। यह पराजय किसी भी युवा नेता को राजनीति से दूर कर सकती थी, लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने उस हार को उनके लिए सीख में बदल दिया। उन्होंने जो बात कही, वह आज भी बिहार की राजनीति में एक मिसाल के रूप में दोहराई जाती है कि पार्टी टिकट चुनाव जीतने के लिए नहीं, नेता बनाने के लिए दिया जाता है।
इस सीख ने श्रवण कुमार को टूटने नहीं दिया। इसके बाद उन्होंने गांव-गांव जाकर आम लोगों के मुद्दे उठाने शुरू किए। 1990 के विधानसभा चुनाव में वे जनता दल के टिकट पर मैदान में उतरे। इस बार हार के बावजूद उन्हें 50 हजार से अधिक वोट मिले, जो उनकी बढ़ती लोकप्रियता का संकेत था। इसी दौर में उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे केवल चुनावी उम्मीदवार नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े जननेता बन चुके हैं।
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1994 में बिहार की राजनीति ने एक नया मोड़ लिया, जब नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडीज ने जनता दल से अलग होकर समता पार्टी का गठन किया। उस समय श्रवण कुमार जनता दल की बिहार इकाई के महासचिव थे, लेकिन उन्होंने पद और सुविधा छोड़कर नीतीश कुमार के साथ खड़ा होना चुना। यह फैसला आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। 1995 के विधानसभा चुनाव में नालंदा सीट से उन्होंने 44 हजार मतों के भारी अंतर से जीत दर्ज की। यहीं से नीतीश कुमार और श्रवण कुमार की जोड़ी बिहार की राजनीति में मजबूती से स्थापित हो गई।
आज, जब उन्हें विधानसभा में एनडीए का मुख्य सचेतक बनाया गया है, तो यह जिम्मेदारी केवल सदन के संचालन तक सीमित नहीं है। यह पद सरकार और विधायकों के बीच सेतु का काम करता है और रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार ने यह दांव ऐसे समय में चला है, जब सदन में समन्वय और अनुशासन दोनों की जरूरत है। श्रवण कुमार का अनुभव और नीतीश कुमार पर उनकी निष्ठा इस भूमिका के लिए उन्हें स्वाभाविक पसंद बनाती है।






















