Sonia Gandhi Palestine Issue: कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक बार फिर केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए हैं। इस बार उनका निशाना इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष को लेकर सरकार की चुप्पी पर रहा। सोनिया गांधी ने कहा कि भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीन के पक्ष में बोलना चाहिए, क्योंकि यह सिर्फ एक राजनीतिक नहीं बल्कि मानवीय और नैतिक मुद्दा है। उनका आरोप है कि मोदी सरकार की चुप्पी दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की व्यक्तिगत दोस्ती का नतीजा है, जो भारत की परंपरागत विदेश नीति के बिल्कुल विपरीत है।
सोनिया गांधी ने इंग्लिश अखबार में प्रकाशित अपने लेख में लिखा कि मोदी सरकार की विदेश नीति अब संवैधानिक मूल्यों या राष्ट्रीय हितों पर आधारित नहीं रह गई है, बल्कि यह नेताओं की व्यक्तिगत संबंधों पर टिकी हुई है। उन्होंने कहा कि जिस तरह अमेरिका के साथ व्यक्तिगत कूटनीति ने हाल ही में भारत को निराश किया, उसी तरह इजराइल-फिलिस्तीन विवाद में भी मोदी सरकार का रुख भारत की छवि को कमजोर कर रहा है।
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने याद दिलाया कि भारत का इतिहास फिलिस्तीन और स्वतंत्रता आंदोलनों के समर्थन का गवाह रहा है। उन्होंने कहा कि भारत ने न केवल 1988 में औपचारिक रूप से फिलिस्तीन को मान्यता दी, बल्कि आजादी से पहले ही दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और अल्जीरिया की स्वतंत्रता की लड़ाई में भी सक्रिय रूप से आवाज उठाई थी। इतना ही नहीं, 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भारत ने बांग्लादेश को अलग राष्ट्र बनने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। ऐसे में मौजूदा सरकार का रुख भारत की ऐतिहासिक नीतियों और नैतिक नेतृत्व से बिल्कुल भिन्न है।
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अपने लेख में सोनिया गांधी ने अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अब फ्रांस समेत ब्रिटेन, कनाडा, पुर्तगाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता दी है। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 150 से अधिक देश पहले ही ऐसा कर चुके हैं। ऐसे में भारत की चुप्पी वैश्विक समुदाय में उसके नेतृत्व की क्षमता पर सवाल खड़े करती है।
सोनिया गांधी का यह लेख पिछले कुछ महीनों में तीसरी बार है जब उन्होंने फिलिस्तीन मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना की है। उनका कहना है कि भारत को न केवल अपने ऐतिहासिक रुख को याद करना चाहिए, बल्कि इस समय नेतृत्व दिखाकर न्याय, पहचान, सम्मान और मानवाधिकारों की लड़ाई में अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए।


















