देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की आज 138 वीं जयंती है। आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को चंद शब्दों में समेटा नहीं जा सकता। संविधान सभा की अध्यक्षता उन्होंने पूरी निष्ठा से की। केंद्रीय खाद्य मंत्री रहे। फिर तो लगातार 12 वर्षों तक भारत गणराज्य के राष्ट्रपति रहे। कार्यकाल पूरा करने के बाद पटना स्थित सदाकत आश्रम को उन्होंने अपना ठौर बनाया। सफलता की तमाम ऊंचाइयों तक पहुंचने के बावजूद राजेंद्र बाबू ने व्यक्तिगत रिश्तो को काफी महत्व दिया। पहले मोबाइल की सुविधा नहीं थी, फोन भी हर जगह सुलभ नहीं था ऐसे में अपनी संवेदना और भावनाओं को पत्र के माध्यम से ही प्रकट किया जाता था।
राजेंद्र बाबू ने अपने मित्र रामनारायण बाबू को भेजा था आभार पत्र
21 सितंबर 1962 को राजेंद्र बाबू ने अपने मित्र रामनारायण बाबू को आभार पत्र भेजा था जिसमें लिखा था कि अपने दुख में आप जैसे स्वजनों की सहृदय सहानुभूति से मुझे बड़ा सहारा मिलता है। संदर्भ था राजेंद्र बाबू की पत्नी के देहांत के बाद उनको भेजे गए संवेदना पत्र का। आज इस घटना को बीते पूरे 60 वर्ष हो गए हैं। पत्र के एक एक शब्द में रिश्तो की गर्माहट समाहित है जो नफा नुकसान पर नहीं सिर्फ भावना पर आधारित है।




















