बिहार मे जातीय जनगणना पर पटना हाई कोर्ट से तो राज्य सरकार को राहत मिल गई है। लेकिन अभी राज्य सरकार की मुश्किलें समाप्त नहीं हुई है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा दी है, जो सोमवार, 7 अगस्त को सुनवाई के लिए लिस्टेड भी हो चुकी है। दूसरी ओर राज्य सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से उनका पक्ष जाने बिना कोई फैसला नहीं लेने की अपील क है। हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली संस्था ‘एक सोच एक प्रयास’ की याचिका न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति एस वी एन भट्टी की पीठ के समक्ष सात अगस्त को सुनवाई के लिए लिस्टेड है। इस याचिका के अलावा भी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एक अन्य याचिका शीर्ष अदालत में दायर की गई है।
अधिकतर जिलों में गणना समाप्ति के करीब
दूसरी ओर, बिहार में जाति आधारित गणना का काम कई जिलों में 100 फीसदी पूरा हो चुका है। जबकि कुछ जिलों में यह काम 95 फीसदी तक हुआ है। बिहार के सबसे बड़े जिले व राजधानी पटना में गणना का काम 92 फीसदी पूरा हो चुका है। अब संभावना यह है कि सरकार शीघ्र ही इस गणना का रिजल्ट जारी करेगी। जिन जिलों में गणना का काम पूरा हो चुका है, वहां आंकड़ों को मिलाने आदि का काम चल रहा है।
एक अगस्त को हाई कोर्ट ने दिया था सर्वेक्षण को ग्रीन सिग्नल
आपको बता दें कि पटना हाईकोर्ट में जाति आधारित गणना के खिलाफ याचिका दाखिल होने के बाद हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया जाति आधारित जनगणना पर अंतरिम रोक लगा दी थी। 3 से 7 जुलाई तक कोर्ट में सुनवाई हुई। 7 जुलाई को सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने फैसला 1 अगस्त तक के लिए सुरक्षित रख लिया। 1 अगस्त को हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीश के विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी के खंडपीठ जातिगत जनगणना करने का आदेश दिया।
500 करोड़ रुपए खर्च कर हो रही गणना
पटना हाईकोर्ट ने अपने 101 पृष्ठों के फैसले में राज्य सरकार के सर्वेक्षण को वैध पाया था। जाति आधारित सर्वेक्षण का पहला चरण 21 जनवरी को पूरा हो गया था। घर-घर सर्वेक्षण के लिए गणनाकारों और पर्यवेक्षकों सहित लगभग 15,000 अधिकारियों को विभिन्न जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। इस कवायद के लिए राज्य सरकार अपनी आकस्मिक निधि से 500 करोड़ रुपये का खर्च निर्धारित किया है।




















