Suicide Pact Case: भारत के न्यायिक इतिहास में आत्महत्या समझौते यानी सुसाइड पैक्ट को लेकर एक अहम कानूनी व्याख्या सामने आई है। मंगलवार को Supreme Court of India ने स्पष्ट किया कि यदि दो लोग मिलकर आत्महत्या का निर्णय करते हैं और उनमें से एक जीवित बच जाता है, तो वह दूसरे की मौत के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार माना जाएगा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जीवित बचा व्यक्ति आत्महत्या के लिए उकसाने यानी IPC की धारा 306 के तहत दोषी होगा।
यह फैसला 2002 में हुई दक्षिण भारतीय फिल्म अभिनेत्री Prathyusha की मौत से जुड़े बहुचर्चित मामले में सुनाया गया। अदालत ने गुडीपल्ली सिद्धार्थ रेड्डी की दो साल की सजा को बरकरार रखते हुए उसे चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि आरोपी का आचरण सीधे तौर पर आत्महत्या को संभव बनाने वाला था और यह भारतीय दंड संहिता की धारा 107 के तहत उकसावे की श्रेणी में आता है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आत्महत्या समझौता केवल जहर खरीदने या किसी साधन को उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होता। इसमें मानसिक सहमति, एक-दूसरे को भरोसा देना और साथ मरने का संकल्प भी शामिल होता है। न्यायालय के अनुसार, जब दो लोग यह तय करते हैं कि वे साथ जीवन समाप्त करेंगे, तो दोनों एक-दूसरे के निर्णय को मजबूत करते हैं। यदि एक पीछे हट जाए तो दूसरा भी रुक सकता है। इसलिए जो व्यक्ति बच गया, उसकी मौजूदगी ही दूसरे के लिए एक उत्प्रेरक का काम करती है।
मामले की पृष्ठभूमि बेहद संवेदनशील रही है। अभिनेत्री और आरोपी पिछले करीब दस वर्षों से एक-दूसरे को जानते थे और शादी करना चाहते थे। अभिनेत्री की मां ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया था, लेकिन आरोपी के परिवार ने इसका विरोध किया। आरोप है कि आरोपी की मां ने बेटे को शादी करने पर आत्महत्या की धमकी दी थी। इसी तनाव के बीच 23 फरवरी 2002 को दोनों एक ब्यूटी पार्लर में मिले और बाद में जहर पी लिया। अस्पताल में भर्ती होने पर आरोपी बच गया, जबकि अभिनेत्री की मौत हो गई।
जांच में सामने आया कि आरोपी ने घटना से पहले एक कीटनाशक खरीदा था और वही जहर दोनों ने सॉफ्ट ड्रिंक में मिलाकर पीया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिनेत्री अस्पताल पहुंचते समय होश में थीं और उन्होंने डॉक्टरों को बताया था कि उन्होंने स्वयं जहर खाया है। फॉरेंसिक रिपोर्ट में भी शरीर में ऑर्गेनोफॉस्फेट जहर की पुष्टि हुई। गला दबाने या यौन उत्पीड़न के आरोपों को अदालत ने सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में शुरुआती पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने वाले डॉक्टर की आलोचना करते हुए कहा कि अधूरी जानकारी के आधार पर सार्वजनिक बयान देना जांच को भटका सकता है और समाज में गलत धारणा बना सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि न्याय व्यवस्था को जनभावना या भीड़ के दबाव से नहीं चलाया जा सकता। न्याय का रास्ता केवल साक्ष्य और कानून के आधार पर तय होना चाहिए।




















