आईएस अधिकारी के.के. पाठक अपने कड़क अंदाज के लिए जाने जाते हैं। जब से उन्हें बिहार शिक्षा विभाग का अपर मुख्य सचिव बनाया गया है तब से वो लगतार सुर्ख़ियों में बने हुए हैं। पहले तो शिक्षा मंत्री प्रो. चंद्रशेखर से उनकी तनातनी का मामला सामने आया। हालांकि नीतीश कुमार के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हो गया। उसके बाद से के.के. पाठक शिक्षा विभाग से जुड़े एक के बाद एक बड़े फैसलों को लेकर खबरों में बने हुए हैं। विपक्ष पहले से ही नीतीश सरकार में अफसरशाही हावी होने का आरोप लगता रहा हैं। के.के. पाठक को लेकर विपक्ष को एक और हथियार मिल गया है जिससे वो नीतीश सरकार पर हमला कर रही है। भाजपा के राज्यसभा सांसद सुशील मोदी ने तो नीतीश कुमार को नसीहत देते हुए कहा कि उन्हें के.के. पाठक को अपना सलाहकार बना लेना चाहिए।
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“शिक्षा विभाग को सनकी तरीके से हाँका जा रहा“
सुशील मोदी ने कहा कि शिक्षा विभाग को सनकी तरीके से हाँका जा रहा है। वहाँ मंत्री तक की नहीं चलती और नियम-कानून से कोई वास्ता नहीं है। 20जुलाई को संगीत शिक्षकों की नियुक्ति से संबंधित मामले में शिक्षा विभाग ने दिल्ली से बुलाये गए वकीलों को पटना हाईकोर्ट में पेश कर राज्य के अटार्नी जनरल पी के शाही तक को असहज स्थिति में डाल दिया। इस पर एजी को खेद प्रकट करना पड़ा। बिहार न्यायिक अधिकारी अधिनियम-2023 के नियम-13 के अनुसार कोई भी सरकारी विभाग एजी की अनुमति के बिना बिहार से बाहर के किसी वकील से पैरवी नहीं करा सकता।
नीतीश को नसीहत
यदि शिक्षा विभाग के अपर मुख्यसचिव ने नियम-कानून का पालन किया होता, तो हाईकोर्ट में सरकार की फजीहत न होती। शिक्षा विभाग की मनमानी पर सरकारी वकीलों ने ही न्यायपीठ के समक्ष आपत्ति की और एजी को स्वीकार करना पड़ा कि उनकी अनुमति के बिना बाहरी वकील बुलाये गए थे। यदि नीतीश कुमार को शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव का यही तौर-तरीका पसंद है, तो उन्हें ही मुख्यमंत्री का सलाहकार बना लेना चाहिए।




















