Tarapur Vidhansabha Election 2025: बिहार की सियासत में तारापुर विधानसभा सीट (निर्वाचन क्षेत्र संख्या-164) हमेशा से चर्चा में रही है। मुंगेर जिले की इस सीट का जुड़ाव जमुई लोकसभा क्षेत्र से है और यह सीट 1951 में अस्तित्व में आई थी। शुरुआती दौर में कांग्रेस का यहां पर दबदबा था। 1951 से लेकर 1972 तक कांग्रेस ने पांच बार जीत दर्ज की, लेकिन 1990 के बाद से कांग्रेस की पकड़ पूरी तरह ढीली हो गई और पार्टी का आधार सिकुड़ने लगा।
चुनावी इतिहास
तारापुर की राजनीति का समीकरण देखें तो यहां 2000 में पहली बार आरजेडी ने जीत दर्ज की थी। आरजेडी को अब तक कुल तीन बार इस सीट पर जनादेश मिला। लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों से यह सीट जेडीयू के कब्जे में है और लगातार मजबूत होती जा रही है। नीतीश कुमार की पार्टी ने यहां 2010 से अपनी जड़ें मजबूत करनी शुरू की थीं। पहले नीता चौधरी, फिर 2015 में एमएल चौधरी और 2020 में मेवालाल चौधरी ने जीत दर्ज कर इस सीट को जेडीयू के गढ़ में बदलने का काम किया।
Katoria Vidhan Sabha 2025: बीजेपी-आरजेडी की टक्कर और बदलते राजनीतिक हालात
2020 का चुनाव खास था क्योंकि इसमें जेडीयू के मेवालाल चौधरी ने आरजेडी उम्मीदवार दिव्य प्रकाश को करीब 6,000 वोटों से मात दी। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, मेवालाल चौधरी को 64,468 वोट मिले, जबकि दिव्य प्रकाश को 57,243 वोटों से संतोष करना पड़ा। यह परिणाम साफ दिखाता है कि जेडीयू के पक्ष में जातीय और राजनीतिक समीकरण मजबूती से खड़े हैं।
जातीय समीकरण
तारापुर में जातीय समीकरण की अहम भूमिका है। यहां कुशवाहा या कोईरी वोट निर्णायक साबित होते हैं। इनके अलावा मुस्लिम, यादव और ब्राह्मण समुदाय के मतदाता भी चुनावी तस्वीर को प्रभावित करते हैं। राजपूत, चमार, कुर्मी, मुसहर और दुसाध जातियों की भी प्रभावी हिस्सेदारी है। यही वजह है कि हर दल यहां जातीय समीकरणों को साधने में जुटा रहता है।
तारापुर की जनसंख्या लगभग 4.56 लाख है, जिसमें 87.63 फीसदी लोग ग्रामीण और 12.37 फीसदी लोग शहरी क्षेत्र में रहते हैं। एससी समुदाय की हिस्सेदारी 15.1% और एसटी की 1.97% है। यहां के राजनीतिक इतिहास में दो परिवारों का भी गहरा प्रभाव रहा है—शकुनी चौधरी और मेवालाल चौधरी। शकुनी चौधरी के बेटे सम्राट चौधरी आज नीतीश कैबिनेट में मंत्री हैं, जबकि मेवालाल चौधरी जेडीयू से ताल्लुक रखते रहे हैं। यही पारिवारिक राजनीति और जातीय समीकरण तारापुर को बिहार की अहम विधानसभा सीट बना देते हैं।
आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जेडीयू अपनी पकड़ बनाए रखेगी या आरजेडी यहां दोबारा वापसी करेगी। कांग्रेस के लिए यह सीट अब बीते दिनों की बात हो चुकी है, लेकिन सियासी गठबंधन समीकरण भविष्य की तस्वीर बदल सकते हैं।






















