बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सियासी संवाद का मंच मानी जाती रही है। इस बार यह मंच पूर्व मंत्री और जनशक्ति जनता दल (JJD) के सुप्रीमो तेज प्रताप यादव (Tej Pratap Yadav) के हाथों एक नए संदेश के साथ सामने आया है। पिता लालू प्रसाद यादव की वर्षों पुरानी दही-चूड़ा परंपरा को तेज प्रताप ने न सिर्फ जिंदा किया, बल्कि उसे अपनी नई राजनीतिक पहचान से भी जोड़ दिया। उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा के सरकारी आवास पर उनका अचानक पहुंचना इसी बदलते राजनीतिक संकेत का प्रतीक बन गया।

तेज प्रताप यादव ने मकर संक्रांति पर होने वाले चूड़ा-दही भोज के लिए किसी प्रतिनिधि को नहीं, बल्कि खुद को आगे रखा। उन्होंने विजय सिन्हा को पारंपरिक तिलक लगाकर आमंत्रण दिया, जो बिहार की राजनीति में सौहार्द और रणनीति के अनोखे मेल के रूप में देखा जा रहा है। यह मुलाकात भले ही संक्षिप्त रही हो, लेकिन इसके निहितार्थ लंबे माने जा रहे हैं। सत्ता पक्ष के एक बड़े चेहरे के दरवाजे पर जाकर न्योता देना यह दर्शाता है कि तेज प्रताप अब सिर्फ विरोध की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहते।
मीडिया से बातचीत में तेज प्रताप ने राजनीति और संस्कार के फर्क को रेखांकित करते हुए कहा कि पर्व का उद्देश्य जोड़ना होता है, तोड़ना नहीं। उनका यह बयान सीधे तौर पर उस राजनीति की ओर इशारा करता है, जहां व्यक्तिगत संबंध और सामाजिक परंपराएं सियासी समीकरणों को नया आकार देती हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर सत्ता और विपक्ष के तमाम दिग्गजों को न्योता देने की घोषणा ने इस आयोजन को और अधिक चर्चा में ला दिया है।
यह आयोजन इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह पहली बार है जब तेज प्रताप यादव अपनी अलग पार्टी JJD के बैनर तले इतना बड़ा राजनीतिक-सामाजिक कार्यक्रम कर रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस मंच पर उनके छोटे भाई तेजस्वी यादव भी नजर आएंगे।
लालू प्रसाद यादव के दौर में दही-चूड़ा भोज बिहार की राजनीति का ऐसा रंगीन अध्याय रहा है, जहां कट्टर विरोधी भी एक साथ बैठकर भोजन करते नजर आते थे। अब वही विरासत तेज प्रताप नए अंदाज में आगे बढ़ाना चाहते हैं। 14 जनवरी को होने वाला यह आयोजन केवल एक भोज नहीं, बल्कि यह देखने का मौका होगा कि बिहार की राजनीति में रिश्तों और रस्मों का यह तड़का आने वाले समय में कौन-सा नया समीकरण गढ़ता है।






















