Tejashwi Yadav: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से लैंड फॉर जॉब मामले में आरोप तय होने के बाद बिहार की राजनीति अचानक तेज रफ्तार में आ गई है। फैसले ने सिर्फ लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की मुश्किलें नहीं बढ़ाईं, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल के भविष्य को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। लालू यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, मीसा भारती, हेमा यादव समेत कुल 41 लोगों पर आरोप तय होते ही यह साफ हो गया है कि मामला अब कानूनी प्रक्रिया के निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुका है और जेल का खतरा सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि वास्तविक आशंका बन चुका है।
इसी बीच तेजस्वी यादव ने एक ऐसा रणनीतिक फैसला लिया है, जिसने बीजेपी और जेडीयू दोनों को सतर्क कर दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद तेजस्वी ने राजनीतिक तौर पर खुद को पूरी तरह सक्रिय करने का संकेत दिया है। छुट्टियों और निजी आयोजनों के बाद दिल्ली में अदालत में मौजूदगी और फिर पटना लौटने की तैयारी यह बताती है कि आरजेडी नेतृत्व अब किसी भी सूरत में खालीपन नहीं छोड़ना चाहता। अंदरखाने जो चर्चा सबसे तेज है, वह यह कि अगर कानूनी संकट गहराता है और तेजस्वी यादव को जेल जाना पड़ता है, तो पार्टी की कमान किसके हाथ में होगी।
इस सवाल का जवाब बिहार की राजनीति को तीन दशक पीछे ले जाता है। 1997 में जब चारा घोटाले के बाद लालू यादव जेल गए थे, तब उन्होंने पार्टी और सत्ता की बागडोर किसी वरिष्ठ नेता को सौंपने के बजाय अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया था। उस फैसले ने न सिर्फ आरजेडी को टूटने से बचाया, बल्कि यह भी दिखाया कि संकट के समय लालू परिवार नेतृत्व पार्टी से बाहर जाने नहीं देता। अब वही इतिहास खुद को दोहराने की दहलीज पर खड़ा दिख रहा है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि तेजस्वी यादव भी पिता की रणनीति को दोहरा सकते हैं। अगर कानूनी हालात बिगड़ते हैं, तो उनकी पत्नी राजश्री यादव को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। यही वजह है कि उन्हें “दूसरी राबड़ी देवी” के रूप में देखा जा रहा है। आरजेडी के 29 साल के इतिहास में यह तथ्य बेहद अहम है कि पार्टी की कमान कभी भी लालू परिवार से बाहर नहीं गई। तेज प्रताप यादव पहले ही राजनीतिक और पारिवारिक मुख्यधारा से अलग हो चुके हैं, ऐसे में विकल्प सीमित हैं।
लैंड फॉर जॉब मामला अपने आप में गंभीर है। आरोप है कि 2004 से 2009 के बीच रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने रेलवे में ग्रुप डी की नौकरियों के बदले उम्मीदवारों या उनके रिश्तेदारों से पटना और आसपास की कीमती जमीनें अपने परिवार और कंपनियों के नाम ट्रांसफर कराईं। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक कई जमीनें बाजार मूल्य से बेहद कम कीमत पर ली गईं। अदालत ने प्रथम दृष्टया इसे सत्ता के दुरुपयोग और सुनियोजित साजिश का मामला माना है। अब जब आरोप तय हो चुके हैं, तो यह सिर्फ राजनीतिक बहस नहीं रह गई, बल्कि कानूनी लड़ाई का गंभीर मोड़ बन गया है।
तेजस्वी यादव फिलहाल नेता प्रतिपक्ष हैं और खुद को भविष्य के मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करते रहे हैं। लेकिन दोष सिद्ध होने की स्थिति में न सिर्फ उनका विधायक पद, बल्कि उनका पूरा राजनीतिक भविष्य दांव पर लग सकता है। यही कारण है कि पार्टी के भीतर उत्तराधिकार की तैयारी को लेकर फुसफुसाहट तेज हो गई है। राजश्री यादव का नाम इसीलिए सामने आ रहा है क्योंकि संकट के समय परिवार के भीतर सत्ता हस्तांतरण आरजेडी की आजमाई हुई रणनीति रही है।
बीजेपी और जेडीयू इस पूरे मामले को भ्रष्टाचार और परिवारवाद के बड़े उदाहरण के तौर पर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में हैं, जबकि आरजेडी इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बता रही है। एक तरफ अदालत में कानूनी लड़ाई है, दूसरी तरफ सड़कों और चुनावी मंचों पर नैरेटिव की जंग। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि अदालत का अगला कदम क्या होगा और तेजस्वी यादव अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए कौन सा रास्ता चुनते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि लैंड फॉर जॉब केस ने बिहार की राजनीति को एक बार फिर लालू परिवार के इर्द-गिर्द ला खड़ा किया है। सवाल अब सिर्फ सजा का नहीं, बल्कि आरजेडी की कमान और बिहार की सत्ता राजनीति की दिशा का है।






















