Tejashwi Yadav Foreign Trip: बिहार विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव अपनी निजी विदेश यात्रा से परिवार के साथ वापस लौट चुके हैं, लेकिन उनके लौटते ही राजनीति का तापमान और चढ़ गया है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद एनडीए सरकार के गठन और 18वीं बिहार विधानसभा की शुरुआत के बीच तेजस्वी यादव का विदेश जाना अब केवल एक निजी यात्रा भर नहीं रह गया है, बल्कि यह विपक्ष की भूमिका, संवैधानिक जिम्मेदारी और राजनीतिक नैतिकता से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।
तेजस्वी यादव पहले भी कई बार निजी और आधिकारिक विदेश यात्राएं कर चुके हैं, लेकिन इस बार मामला इसलिए गंभीर हो गया क्योंकि यह यात्रा ऐसे समय पर हुई जब वे राज्य के नेता प्रतिपक्ष हैं और विधानसभा का पहला सत्र शुरू हो रहा था। विपक्ष के नेता के रूप में उनकी सदन में मौजूदगी को राजनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जा रहा था। इसी को लेकर एनडीए के घटक दल लगातार उन पर हमलावर हैं।
बीजेपी नेता और बिहार सरकार के मंत्री प्रमोद कुमार ने तेजस्वी यादव की विदेश यात्रा पर सीधे तौर पर संदेह जताते हुए इसकी जांच की मांग कर दी है। उनका कहना है कि जब तेजस्वी यादव के परिवार की संपत्तियों की जांच हो रही है, तब उनकी विदेश यात्रा भी उसी तरह जांच के दायरे में आनी चाहिए। वहीं जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने भी विधानसभा सत्र के दौरान अचानक विदेश चले जाने को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी से दूरी करार दिया है।
इस विवाद को और धार तब मिली, जब जेडीयू के एमएलसी नीरज कुमार ने कुछ दिन पहले गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि तेजस्वी यादव के साथ उनकी निजी विदेश यात्रा में दो ऐसे लोग भी शामिल थे, जिनका आपराधिक इतिहास रहा है। नीरज कुमार ने आरोप लगाया कि इनमें रमीज नेमत खान और देव गुप्ता शामिल थे। रमीज नेमत खान पर उत्तर प्रदेश में हत्या का आरोप बताया गया, जबकि देव गुप्ता को कई मामलों में आरोपी और इनामी अपराधी बताया गया। नीरज कुमार ने इस संबंध में डीजीपी को पत्र लिखकर जांच की मांग भी की थी। हालांकि इन आरोपों पर अब तक तेजस्वी यादव की ओर से कोई सार्वजनिक जवाब नहीं आया है।
यह साफ है कि तेजस्वी यादव की यह पहली विदेश यात्रा नहीं है। दिसंबर 2023 में उपमुख्यमंत्री रहते हुए उन्हें ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की आधिकारिक यात्रा के लिए दिल्ली की राउस एवेन्यू कोर्ट से अनुमति लेनी पड़ी थी। सितंबर 2024 में भी अदालत ने उन्हें परिवार के साथ दुबई जाने की इजाजत दी थी। चूंकि तेजस्वी यादव जमीन के बदले नौकरी जैसे मामलों में आरोपी हैं, इसलिए अदालत की अनुमति उनकी विदेश यात्रा के लिए एक अहम कानूनी शर्त रही है।
यहीं से मौजूदा विवाद और गहराता है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस बार तेजस्वी यादव ने विदेश जाने से पहले नीतीश सरकार, विदेश मंत्रालय या अदालत से जरूरी अनुमति ली थी या नहीं। यदि अनुमति ली गई थी तो सरकार को इसे स्पष्ट करना चाहिए और यदि नहीं ली गई, तो यह संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन माना जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि सत्ता पक्ष इस पर आरोप तो लगा रहा है, लेकिन यह साफ नहीं कर रहा कि मंजूरी दी गई थी या नहीं। दूसरी ओर आरजेडी की चुप्पी भी कई तरह के संदेह को जन्म दे रही है।
संवैधानिक और सुरक्षा व्यवस्था के तहत किसी भी मंत्री, नेता प्रतिपक्ष या वरिष्ठ जनप्रतिनिधि की विदेश यात्रा की जानकारी सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को देना अनिवार्य होता है। वीआईपी सुरक्षा से जुड़े ‘येलो बुक’ प्रोटोकॉल के अनुसार, जनप्रतिनिधियों की विदेश यात्रा की पूर्व सूचना जरूरी होती है ताकि सुरक्षा इंतजाम सुनिश्चित किए जा सकें। ऐसे में तेजस्वी यादव की यात्रा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और सुरक्षा से जुड़ा सवाल भी बन गई है।
सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि जब बिहार में नई विधानसभा का गठन हो रहा था और पहला सत्र चल रहा था, तब नेता प्रतिपक्ष का विदेश जाना कितना उचित था। विपक्ष के नेता के तौर पर तेजस्वी यादव उन मतदाताओं और विधायकों के प्रति जवाबदेह हैं जिन्होंने उन्हें इस पद पर बैठाया। उनकी गैरमौजूदगी को एनडीए इसी नजरिए से भुना रहा है।
अब जबकि तेजस्वी यादव विदेश से लौट आए हैं, सियासी दबाव और बढ़ गया है। उनसे अपेक्षा की जा रही है कि वे अपनी यात्रा से जुड़े सभी तथ्यों को सार्वजनिक करें, खासकर उन लोगों को लेकर जिनके साथ यात्रा करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि तेजस्वी यादव इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखते हैं, तो यह चुप्पी ही उनके खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि तेजस्वी यादव इस पूरे विवाद पर क्या सफाई देते हैं और क्या यह मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे किसी जांच तक पहुंचता है।






















