यूजीसी बिल (UGC Bill Protest) को लेकर देशभर में उठ रही असहमति की आवाज अब बिहार में सड़कों पर साफ सुनाई देने लगी है। बुधवार को राजधानी पटना का दिनकर गोलंबर छात्रों के आक्रोश का केंद्र बना, जहां बिहार स्टूडेंट यूनियन और सवर्ण समाज एकता मंच के आह्वान पर बड़ी संख्या में छात्र एकजुट हुए। प्रदर्शनकारियों ने यूजीसी बिल को ‘काला कानून’ बताते हुए इसे समानता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ करार दिया और सरकार से या तो इसे पूरी तरह वापस लेने या फिर व्यापक संशोधन करने की मांग की।
प्रदर्शन के दौरान छात्रों का कहना था कि यह बिल शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बजाय समाज को जातिगत खांचों में बांटने का काम कर रहा है। छात्रों ने दावा किया कि कॉलेज और विश्वविद्यालयों में छात्र जाति पूछकर दोस्ती या पढ़ाई नहीं करते, फिर कानून के जरिए शिक्षा परिसरों में विभाजन की राजनीति क्यों लाई जा रही है। उनका तर्क था कि समान न्याय और समान अवसर की बात तब तक अधूरी है, जब तक हर वर्ग और हर जाति को एक ही तराजू पर नहीं तौला जाए।
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रामधारी सिंह दिनकर की प्रतिमा के सामने खड़े होकर छात्रों ने अपने विरोध को प्रतीकात्मक अर्थ दिया। एक छात्र ने दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तियों का हवाला देते हुए कहा कि कवि की पहचान कभी जाति से सीमित नहीं रही, बल्कि विचारों से बनी। उन्होंने कहा कि वे भगवान राम की पूजा करते हैं, लेकिन जब अन्याय के खिलाफ संघर्ष की बात आती है तो परशुराम की भूमिका निभाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। छात्रों ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने उनकी बात नहीं सुनी तो आंदोलन और तेज होगा और आने वाले दिनों में चक्का जाम जैसे कदम उठाए जाएंगे।
प्रदर्शन में शामिल अमित कुमार ने मौजूदा सामाजिक और आर्थिक हालात का जिक्र करते हुए कहा कि बेरोजगारी और गरीबी का सबसे ज्यादा असर सवर्ण समाज पर भी दिख रहा है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें लगातार निशाने पर लिया जा रहा है। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि जब पांडवों को उनका हक नहीं मिला, तो परिणाम इतिहास ने देखा। उनका कहना था कि आज भी हालात उसी दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं, जो देश के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
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एक अन्य छात्र ने यूजीसी बिल को छात्रों के भविष्य के लिए खतरनाक बताते हुए कहा कि इस कानून के तहत छोटी सी गलती भी किसी स्टूडेंट का करियर बर्बाद कर सकती है। उन्होंने आशंका जताई कि झूठे आरोपों के जरिए छात्रों को फंसाने की संभावना बढ़ जाएगी, जिससे शिक्षा का माहौल भय और अविश्वास से भर जाएगा। कुछ छात्रों ने भावनात्मक स्वर में कहा कि अगर उन्हें सिर्फ उनकी जाति के कारण दोषी ठहराया जा रहा है, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल्यों के खिलाफ है।
प्रदर्शनकारियों का एक सुर में कहना था कि गलत काम गलत ही होता है, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म से जुड़ा हो। न्याय की कसौटी सबके लिए समान होनी चाहिए। छात्रों ने सुझाव दिया कि अगर सरकार किसी समिति का गठन कर रही है, तो उसमें सभी वर्गों और जातियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, ताकि निर्णय संतुलित और निष्पक्ष हो सके।




















