देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इक्विटी रेगुलेशंस (UGC Equity Regulations 2026) अब केवल शैक्षणिक सुधार तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि यह मुद्दा तेजी से एक बड़े राजनीतिक विवाद में तब्दील हो चुका है। नियमों के लागू होते ही जहां सरकार इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं इसके विरोध और समर्थन में देश की राजनीति दो ध्रुवों में बंटती नजर आ रही है। खास बात यह है कि इस बार विवाद विपक्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
मोदी सरकार की मुश्किलें तब बढ़ गईं जब उसके प्रमुख सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने इक्विटी रेगुलेशंस को लेकर सख्त रुख अपनाया। जदयू प्रवक्ता और विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार ने केंद्र सरकार को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि समाज के किसी भी वर्ग में उपेक्षा या असंतोष की भावना लोकतंत्र के लिए घातक हो सकती है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब इस नियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहले ही याचिका दाखिल की जा चुकी है। इससे यह संकेत मिलने लगे हैं कि मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि न्यायिक और संवैधानिक दायरे में भी इसकी गूंज सुनाई देगी।
इक्विटी रेगुलेशंस 2026 को लेकर विरोध का स्वर केवल सहयोगी दलों तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के कुछ पदाधिकारियों ने इन नियमों के विरोध में अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। उनका आरोप है कि दंड के प्रावधानों को कमजोर या हटाए जाने से नियमों का दुरुपयोग बढ़ सकता है। सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि बिना सख्त सजा के प्रावधानों के, शिकायत प्रणाली व्यक्तिगत रंजिश का हथियार बन सकती है और निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जा सकता है। इस आशंका ने शिक्षा जगत के एक बड़े वर्ग को चिंता में डाल दिया है।
दूसरी ओर, इस पूरे विवाद में तेज प्रताप यादव का रुख पूरी तरह स्पष्ट और मुखर नजर आया है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से इक्विटी रेगुलेशंस 2026 का खुला समर्थन करते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भावना के अनुरूप बताया। तेज प्रताप यादव ने कहा कि यह कानून गरीब, दलित, पिछड़े और अतिपिछड़े समाज के छात्रों के हितों की रक्षा के लिए उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है। उनके अनुसार, यह नियम विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में लंबे समय से चली आ रही जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
तेज प्रताप यादव ने यह भी रेखांकित किया कि इक्विटी रेगुलेशंस के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में इक्विटी कमेटी के गठन का लक्ष्य तय किया गया है, जो एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की शिकायतों को सुनेगी और निर्धारित समय सीमा में उनका समाधान करेगी। उनका कहना है कि इससे न केवल पीड़ित छात्रों को न्याय मिलेगा, बल्कि शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी। उन्होंने इसे संविधान में निहित समानता और अधिकारों को जमीनी स्तर पर मजबूत करने वाला कदम बताया।
अपने बयान में तेज प्रताप यादव ने उन लोगों पर भी निशाना साधा, जो इस कानून को सनातन परंपरा से जोड़कर देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि दलित, आदिवासी और पिछड़ा समाज भी सनातन परंपरा का ही हिस्सा है और उन्हें अलग करके देखना न केवल गलत है, बल्कि समाज को बांटने वाला नजरिया भी है। जनशक्ति जनता दल की ओर से उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी इस कानून का समर्थन इसलिए कर रही है, क्योंकि यह शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक न्याय को मजबूती देता है।


















