आज देश की आर्थिक दिशा तय करने वाला दिन है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार नौवीं बार आम बजट (Union Budget 2026) पेश करने जा रही हैं। ऐसे में बिहार की सियासत और जनता की निगाहें इस बजट पर टिकी हुई हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि पिछले दो केंद्रीय बजटों में बिहार को केंद्र सरकार की ओर से कई अहम घोषणाएं और सहायता मिली है। अब सवाल यह है कि क्या इस बार भी बिहार को विकास की वही रफ्तार मिलेगी या फिर राजनीतिक मांगें और आर्थिक हकीकतें केंद्र सरकार के लिए चुनौती बनेंगी।
बिहार में सत्ताधारी एनडीए बजट को लेकर काफी आशावादी दिख रही है। राज्य सरकार में मंत्री दिलीप जायसवाल का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बिहार को विकास के लिए लगातार मजबूत सहयोग मिला है। उनके मुताबिक केंद्र सरकार की नीतियों का असर यह रहा है कि कांग्रेस शासन की तुलना में पिछले 11 वर्षों में बिहार को लगभग साढ़े तीन गुना ज्यादा केंद्रीय सहायता मिली है। उनका दावा है कि डबल इंजन की सरकार का नतीजा आज सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी के रूप में साफ दिख रहा है और बिहार इस मामले में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो चुका है।
जदयू प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद भी इसी तर्क को आगे बढ़ाते हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे में संसाधनों के असमान वितरण से पैदा हुई क्षेत्रीय असंतुलन की समस्या को दूर करना सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले दो केंद्रीय बजटों में बिहार पर खास फोकस रहा है और जो नुकसान कांग्रेस के लंबे शासनकाल में बिहार को हुआ, उसकी भरपाई मौजूदा सरकार लगातार करने की कोशिश कर रही है। जदयू का मानना है कि इस बार भी बजट में बिहार के लिए योजनाओं और केंद्रीय सहायता की निरंतरता बनी रहेगी।
हालांकि, बजट से पहले विपक्ष का सुर पूरी तरह अलग है। राष्ट्रीय जनता दल ने एक बार फिर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग तेज कर दी है। राजद नेता शक्ति सिंह यादव का कहना है कि जब तक बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक राज्य अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता। उनके अनुसार इकोनॉमिक सर्वे रिपोर्ट ने बिहार की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रति व्यक्ति आय जैसे अहम संकेतकों में राज्य सबसे निचले पायदान पर खड़ा है।
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राजद का दावा है कि बिहार में प्रति व्यक्ति दैनिक आय केवल 150 से 190 रुपये के बीच है, जो देश में सबसे कम मानी जाती है। शक्ति सिंह यादव ने यह सवाल भी उठाया कि पिछले दो दशकों में विकास के दावे कहां तक साकार हुए हैं, जब शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति कमजोर बनी हुई है और पलायन लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने ई-श्रम पोर्टल के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि करीब 2 करोड़ 90 लाख बिहारी रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों में दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं। उनके मुताबिक यह आंकड़े डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
राजनीतिक बयानबाजी से अलग, आम आदमी की उम्मीदें कहीं ज्यादा व्यावहारिक हैं। महंगाई से जूझ रही जनता खाने-पीने की चीजों के दामों में राहत चाहती है। रसोई गैस, दाल, तेल और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें आम बजट से जुड़ी सबसे बड़ी अपेक्षाएं बन चुकी हैं। ऐसे में केंद्रीय बजट 2026 न सिर्फ बिहार के लिए विकास और विशेष राज्य जैसे राजनीतिक मुद्दों का इम्तिहान है, बल्कि आम लोगों की जेब को राहत देने की कसौटी भी है।






















