उत्तराखंड की महिला सशक्तिकरण मंत्री के पति द्वारा महिलाओं को लेकर दिए गए आपत्तिजनक बयान ने देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में नई बहस छेड़ दी है। खासकर बिहार में इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। बिहार महिला आयोग की अध्यक्ष प्रोफेसर अप्सरा (Bihar Women Commission Angry) ने इस टिप्पणी को न सिर्फ महिलाओं के सम्मान के खिलाफ बताया, बल्कि इसे एक खतरनाक और पिछड़ी सोच का प्रतीक करार दिया है। उनका कहना है कि ऐसे बयान सिर्फ शब्द नहीं होते, बल्कि वे समाज में महिलाओं की भूमिका और गरिमा पर सीधा हमला करते हैं।
पटना में मीडिया से बातचीत के दौरान प्रो. अप्सरा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्होंने खुद वह वीडियो देखा है और इस पर जितनी कड़ी निंदा की जाए, वह कम है। उन्होंने कहा कि बिहार की महिलाओं को किसी आर्थिक सीमा या रकम के दायरे में बांधकर देखना न केवल अपमानजनक है, बल्कि यह महिलाओं के संघर्ष, योगदान और आत्मसम्मान को नजरअंदाज करने जैसा है। बिहार की महिलाओं ने लोकतंत्र में अपनी ताकत बार-बार साबित की है। उन्होंने अपने अधिकारों और आत्मविश्वास के बल पर सरकारें बनाईं और बदली हैं, ऐसे में उन्हें 20 से 25 हजार रुपये जैसी संकीर्ण सोच में कैद करना शर्मनाक है।
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प्रो. अप्सरा ने यह भी कहा कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े किसी भी व्यक्ति को शब्दों के चयन में बेहद सतर्क रहना चाहिए। जब जिम्मेदार पदों से जुड़े लोग इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो उसका असर समाज के निचले स्तर तक जाता है और महिलाओं के खिलाफ नकारात्मक मानसिकता को बढ़ावा मिलता है। उन्होंने मांग की कि संबंधित व्यक्ति अपने बयान पर सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण दें और खुले तौर पर खेद प्रकट करें, ताकि समाज में यह संदेश जाए कि महिलाओं के सम्मान से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
महिला आयोग की अध्यक्ष ने यह भी साफ किया कि यह मामला सिर्फ नैतिक निंदा तक सीमित नहीं रहेगा। आयोग इस पूरे प्रकरण पर संज्ञान लेगा और संबंधित व्यक्ति से जवाब तलब किया जाएगा। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि जांच के दौरान यह साबित होता है कि बयान महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। उनके अनुसार, महिला सशक्तिकरण केवल योजनाओं और नारों से नहीं, बल्कि सोच और व्यवहार में बदलाव से संभव है।





















