देश में एक बार फिर ‘वंदे मातरम’ (Vande Mataram Controversy) को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जमीयत उलेमा के हालिया बयान के बाद AIMIM के वरिष्ठ नेता अख्तरुल ईमान ने प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर कई अहम सवाल उठाए हैं। उनके बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है, जिससे यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर फिर सुर्खियों में आ गया है।
अख्तरुल ईमान ने कहा कि 1937 में हुई ऐतिहासिक बैठकों के दौरान ‘वंदे मातरम’ की कुछ पंक्तियों को लेकर विवाद सामने आया था और उस समय कई नेताओं ने सर्वसम्मति से कुछ बदलाव किए थे। उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या उस दौर के नेताओं की सोच पर सवाल उठाया जा सकता है, जिन्होंने सभी समुदायों को साथ लेकर देश की एकता और राष्ट्रवाद को मजबूत करने का प्रयास किया था। उनके अनुसार, उस समय राष्ट्रवाद की अवधारणा ऐसी थी जिसमें हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता और दूसरों के धर्म का सम्मान करने की जिम्मेदारी शामिल थी।
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AIMIM नेता ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या करते हुए कहा कि संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और किसी भी व्यक्ति पर किसी विशेष धार्मिक प्रतीक या आस्था को थोपना संविधान की भावना के खिलाफ है। उन्होंने विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने और मानने की स्वतंत्रता देता है।
उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि देश में धीरे-धीरे हिंदू राष्ट्र की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर संसद में प्रस्ताव लाकर किसी नई व्यवस्था पर चर्चा की जाए तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत विचार संभव है, लेकिन विवादास्पद मुद्दों को राजनीतिक रूप देने से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।





















