दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU Protest) परिसर में सोमवार को एक बार फिर राजनीतिक असहमति और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर माहौल गरमा गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के बाद JNU कैंपस में छात्रों का आक्रोश खुलकर सामने आया। यह विरोध प्रदर्शन सबरमती हॉस्टल के बाहर आयोजित किया गया, जिसकी अगुवाई जेएनयू छात्र संघ ने की।
प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने केंद्र सरकार और शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ नारेबाज़ी की, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नाम लेकर लगाए गए नारे भी शामिल थे। जैसे ही इन नारों की जानकारी सार्वजनिक हुई, विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर यह मामला सियासी गलियारों तक पहुंच गया और इस पर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आने लगीं।
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राजनीतिक बहस के केंद्र में अब केवल नारे नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया, लंबी न्यायिक हिरासत और लोकतंत्र में असहमति की सीमाएं भी आ गई हैं। आरजेडी सांसद मनोज झा ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को बिना ट्रायल के वर्षों तक जेल में रखा जाना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या संवैधानिक अधिकारों को सक्रिय होने के लिए सहनशक्ति की आखिरी परीक्षा तक इंतजार करना चाहिए।
मनोज झा ने यह भी स्पष्ट किया कि वे व्यक्तिगत तौर पर ‘मुर्दाबाद’ जैसे नारों के पक्षधर नहीं हैं और एक सभ्य लोकतंत्र में इस तरह की भाषा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने जिस बिंदु पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वह था समाज और राजनीति में दिखने वाला चयनात्मक आक्रोश। उन्होंने सवाल उठाया कि जब बिहार की लड़कियों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं, तब वैसा ही गुस्सा और प्रतिक्रिया क्यों देखने को नहीं मिली।






















