Tejashwi Yadav: मकर संक्रांति के मौके पर तेज प्रताप यादव द्वारा आयोजित दही-चूड़ा भोज ने बिहार की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया। भोज में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की मौजूदगी, भाजपा नेता विजय सिन्हा समेत कई दिग्गजों का पहुंचना और मीडिया की भारी मौजूदगी ने इस आयोजन को खास बना दिया। लेकिन इस पूरे कार्यक्रम में जिस चेहरे की गैरहाजिरी सबसे ज्यादा चर्चा में रही, वह थे नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव। सवाल सिर्फ इतना नहीं था कि वे क्यों नहीं आए, बल्कि इससे बड़ा सवाल यह था कि इस गैरमौजूदगी का राजनीतिक संदेश क्या है।
दरअसल, तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति को यूं ही पारिवारिक दूरी या व्यक्तिगत नाराजगी के तौर पर देखना राजनीतिक तौर पर अधूरा विश्लेषण होगा। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से राष्ट्रीय जनता दल की पूरी रणनीतिक और सांगठनिक कमान तेजस्वी यादव के हाथों में है। पार्टी के भीतर अनुशासन, निर्णय प्रक्रिया और भविष्य की राजनीति को लेकर वे लगातार स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि अब आरजेडी भावनाओं से नहीं, बल्कि सख्त राजनीतिक लाइन पर चलेगी।
तेज प्रताप यादव को पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित करने का फैसला लालू प्रसाद यादव ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर जरूर लिया, लेकिन उस फैसले के सार्वजनिक और राजनीतिक संरक्षण की जिम्मेदारी तेजस्वी यादव ने खुद अपने कंधों पर ली। राबड़ी आवास के बाहर दिया गया उनका बयान अब भी याद किया जा रहा है, जब उन्होंने साफ कहा था कि पार्टी के साथ गलत करने वाला चाहे कोई भी हो, उसके साथ समझौता नहीं किया जाएगा, भले ही वह उनकी अपनी परछाईं क्यों न हो। इसी बयान की राजनीतिक निरंतरता तेज प्रताप के भोज में तेजस्वी की गैरहाजिरी में दिखाई देती है।
अगर तेजस्वी यादव उस कार्यक्रम में शामिल होते, तो यह संदेश जा सकता था कि पार्टी से निष्कासित नेता के साथ नरमी बरती जा रही है। ऐसे समय में, जब आरजेडी के भीतर चुनाव के दौरान कथित भीतरघात करने वाले नेताओं पर कार्रवाई की चर्चा तेज है, तेजस्वी किसी भी तरह का गलत संकेत नहीं देना चाहते थे। यह साफ तौर पर पार्टी कैडर और विधायकों के लिए एक संदेश था कि अनुशासन से ऊपर कोई नहीं है और संगठनात्मक फैसले भावनाओं से प्रभावित नहीं होंगे।
इसके साथ ही यह भी गौर करने वाली बात है कि तेज प्रताप यादव के भोज में आरजेडी के सक्रिय विधायकों या बड़े संगठनात्मक चेहरों की मौजूदगी बेहद सीमित रही। पार्टी के एक-दो नामों को छोड़ दें, तो आयोजन में ज्यादातर चेहरे गैर-राजद या अन्य दलों से जुड़े दिखे। यह तस्वीर खुद ब खुद यह संकेत देती है कि पार्टी के भीतर तेजस्वी यादव की लाइन को अधिकांश नेता स्वीकार कर चुके हैं और वे उसी के अनुसार सार्वजनिक व्यवहार कर रहे हैं।
तेज प्रताप यादव द्वारा अपने बयान में ‘जयचंद’ शब्द का इस्तेमाल और तेजस्वी यादव के करीबी संजय यादव पर इशारा भी इस दूरी की वजह को और स्पष्ट करता है। तेजस्वी यादव के लिए यह सिर्फ एक पारिवारिक या भावनात्मक मुद्दा नहीं था, बल्कि नेतृत्व और संगठन की साख से जुड़ा सवाल था। ऐसे में भोज में जाना उनके उस स्टैंड के खिलाफ होता, जिसे वे लगातार दोहरा रहे हैं।






















