उत्तर भारत में गहराते वायु प्रदूषण के संकट (Air Pollution Crisis) को लेकर पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने केंद्र सरकार पर सीधा और तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदूषण जैसे जीवन-मरण के सवाल पर न तो कोई ठोस बजट रखा गया, न ही कैबिनेट स्तर पर गंभीर चर्चा हुई। पप्पू यादव के अनुसार सरकार की प्राथमिकताओं में आम आदमी का जीवन नहीं, बल्कि नाम बदलने, नफरत और बयानबाजी की राजनीति है।
उन्होंने कहा कि जब हवा जहरीली हो चुकी है और बच्चे, बुजुर्ग व मजदूर सांस लेने के लिए जूझ रहे हैं, तब भी सत्ता तंत्र मौन है। यह मौन बताता है कि नीति का अभाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का भी प्रतीक है। पप्पू यादव ने संसद और विधानसभाओं की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि वहां आम आदमी की रोजमर्रा की समस्याओं पर चर्चा ही नहीं होती, जबकि वास्तविक भारत आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है।
सांसद ने आर्थिक असमानता को प्रदूषण संकट से जोड़ते हुए कहा कि देश की बड़ी आबादी सीमित राशन पर जीवन चला रही है और करोड़ों लोगों के पास आज भी अपना घर नहीं है। इसके उलट सत्ता के गलियारों में बैठे लोग एयर कंडीशनर में बैठकर नीतियां बनाते हैं, जिससे जमीन पर जहरीली हवा की हकीकत उनसे दूर रहती है। उन्होंने कटाक्ष किया कि जो खुद प्रदूषण के दुष्परिणामों से सुरक्षित हैं, वे इसे ठीक करने की इच्छाशक्ति कैसे दिखाएंगे।
पप्पू यादव ने कोरोना काल का उदाहरण देते हुए कहा कि वह एक बड़ी मानव निर्मित आपदा थी, जिसे नेताओं और सिस्टम की लापरवाही ने और अधिक क्रूर बना दिया। इसी तरह वायु प्रदूषण भी आज एक साइलेंट इमरजेंसी बन चुका है, जहां एक तरफ औद्योगिक गतिविधियों और अव्यवस्थित शहरीकरण से जहर पैदा हो रहा है और दूसरी तरफ सरकार समाधान की बातें कर रही है, लेकिन नीति और क्रियान्वयन दोनों गायब हैं।





















