बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जन सुराज पार्टी (JSP), जिसे प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने एक नई राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश किया था, को एक चौंकाने वाला परिणाम मिला। लगभग हर उस लोकतांत्रिक उम्मीद को ध्वस्त करते हुए, उनकी पार्टी कोई भी सीट जीतने में नाकामयाब रही। शुरुआती रुझानों में चार सीटों पर बढ़त दिखने के बाद, गिनती की प्रक्रिया में वह सब बढ़त गायब हो गई और अंततः पार्टी 0 में सिमट गई।
यह परिणाम न सिर्फ आर्थिक लेकिन राजनीतिक रूप से भी एक बड़ा झटका है। कई विश्लेषकों ने पहले ही कहा था कि JSP अपने पहले चुनाव में संगठन की कमी और मजबूत बूथ-स्तरीय आधार बनाने में असफल रही है। इसके चलते, प्रशांत किशोर की “नया राजनीति” देने की भूख जनता के वोटों में बदल नहीं सकी, वहीं पारंपरिक पार्टियों की मजबूत पेड़-जड़ प्रणाली ने अपने वोट बैंक को कायम रखा।
चौंकाने वाली बात यह है कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर अब प्रशांत किशोर के संन्यास की चर्चा तेज हो गई है। पटना के कई चौक-चौराहों में नारी शक्ति समूह द्वारा लगाए गए पोस्टर में उनके संन्यास की मांग और वादे को याद दिलाया गया है: चुनाव के दौरान किशोर ने कहा था कि अगर जदयू को 25 से अधिक सीटें मिलीं तो वह राजनीति छोड़ देंगे, और अब जदयू 85 सीटों के पार जाने के बाद यह वादा फिर सुर्खियों में है।
हालाँकि, अभी तक किशोर की ओर से इस संन्यास की घोषणा पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। उनका मौन राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलों को जन्म दे रहा है। कुछ लोग इसे उनके रणनीतिक आत्म-मूल्यांकन का संकेत मानते हैं, जबकि अन्य इसे उनके राजनीतिक करियर का एक बड़ा धक्का बता रहे हैं।
फिर भी, यह सच है कि जन सुराज का भरोसा सिर्फ वोटों में नहीं बदला, लेकिन उसने बिहार की राजनीतिक बहस को प्रभावित जरूर किया। किशोर ने बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा और शासन सुधार जैसे मुद्दों को उठाया, और ये मुद्दे अन्य पार्टियों की चुनावी रणनीति में भी शामिल हुए।
इस हार के बावजूद, उनके समर्थकों का कहना है कि यह केवल एक चुनाव की लड़ाई है, “युद्ध खत्म नहीं हुआ है।” सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर पार्टी समर्थकों ने यह जिक्र किया है कि JSP ने हर विधानसभा में कुछ मानवता-आधारित वोट हासिल किए हैं, जो भविष्य में जन सुराज के लिए आधार बन सकते हैं।






















