पटना: बिहार की राजनीति में 1969 का मध्यावधि चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। यह चुनाव राजनीतिक जोड़-तोड़, विधायकों की खरीद-फरोख्त और सत्ता परिवर्तन के नाटकीय घटनाक्रमों के लिए जाना जाता है। अगर मध्यावधि चुनाव से राजनीतिक अस्थिरता खत्म हो सकती, तो 1969 के बाद बिहार में स्थिरता आ जाती। लेकिन चुनाव के बाद भी अराजकता और अस्थिरता का दौर जारी रहा।
खंडित जनादेश: कांग्रेस और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की ताकत घटी
1969 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) दोनों को नुकसान हुआ।
• कांग्रेस को 1967 में 128 सीटें मिली थीं, लेकिन 1969 में वह घटकर 118 सीटों पर आ गई।
• संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को भी आंतरिक कलह का खामियाजा भुगतना पड़ा और उसकी सीटें 68 से घटकर 52 रह गईं।
• भारतीय जनसंघ को 34 सीटें मिलीं, जो 1967 के मुकाबले 8 सीटों का फायदा था।
• भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने 24 से 25 सीटें जीतकर मामूली सुधार किया।
• निर्दलीय विधायकों की संख्या भी घटी, 1967 में 33 निर्दलीय विधायक थे, जो 1969 में घटकर 24 रह गए।
स्वतंत्र पार्टी का पतन और जनता पार्टी की वापसी
राजा कामाख्या नारायण सिंह ने स्वतंत्र पार्टी से नाता तोड़ लिया और अपनी जनता पार्टी को पुनर्जीवित किया।
• स्वतंत्र पार्टी को भारी नुकसान हुआ, वह 68 सीटों से घटकर सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गई।
• जनता पार्टी ने 14 सीटें जीतकर अपनी वापसी की।
• प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) की स्थिति जस की तस बनी रही और उसके 18 विधायक जीतकर आए।
• CPM को 1 सीट का नुकसान हुआ और उसे सिर्फ 3 सीटें मिलीं।
• अन्य दलों के 27 उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे।
पांच साल में छह मुख्यमंत्री, दो बार राष्ट्रपति शासन
इस चुनाव के बाद बिहार की राजनीति में अस्थिरता चरम पर थी।
• अगले पांच वर्षों में छह मुख्यमंत्री बदले।
• दो बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया, जिसकी कुल अवधि लगभग नौ महीने रही।
• 1972 में जब फिर से चुनाव हुए, तब भी राज्य राष्ट्रपति शासन के अंतर्गत था।
कांग्रेस में विभाजन: कांग्रेस (आर) और कांग्रेस (ओ) का जन्म
इस दौरान इंदिरा गांधी पार्टी के दिग्गज नेताओं से छुटकारा पाने की कोशिश कर रही थीं, जिसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस दो गुटों में बंट गई।
बिहार विधानसभा चुनाव 1967: पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, लेकिन जल्द गिर गई
- इंदिरा गांधी की कांग्रेस “कांग्रेस (आर)” के नाम से जानी गई।
- पुराने दिग्गज नेताओं की कांग्रेस “कांग्रेस (ओ)” के नाम से पहचानी गई।
लगातार बदलते मुख्यमंत्री: जोड़-तोड़ की राजनीति हावी
- हरिहर सिंह (कांग्रेस) मुख्यमंत्री बने, लेकिन सिर्फ 116 दिनों (चार महीने से भी कम) में उनकी सरकार गिर गई।
- भोला पासवान शास्त्री (कांग्रेस-ओ) मुख्यमंत्री बने, लेकिन सिर्फ 13 दिनों में इस्तीफा देना पड़ा।
- बिहार में सात महीने तक राष्ट्रपति शासन रहा।
- दरोगा प्रसाद राय (कांग्रेस-आर) मुख्यमंत्री बने, लेकिन 10 महीनों में सरकार गिर गई।
- कर्पूरी ठाकुर (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) मुख्यमंत्री बने, लेकिन इंदिरा गांधी की जोड़-तोड़ की राजनीति ने उनकी सरकार भी गिरा दी।
- भोला पासवान शास्त्री तीसरी बार मुख्यमंत्री बने, इस बार 222 दिनों तक पद पर रहे।
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध और इंदिरा गांधी की ताकत बढ़ी
1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, जिसमें पाकिस्तान को करारी हार मिली और बांग्लादेश का जन्म हुआ। इस जीत के बाद इंदिरा गांधी का कद राष्ट्रीय राजनीति में और बढ़ गया।
बिहार में जोड़-तोड़ का अंत नहीं
हालांकि, बिहार की राजनीति इन सब घटनाओं से अछूती रही। यहां जोड़-तोड़ और सत्ता परिवर्तन का खेल लगातार जारी रहा।
• 9 जनवरी 1972 को भोला पासवान शास्त्री को फिर इस्तीफा देना पड़ा।
• अगले दो महीने तक बिहार में राष्ट्रपति शासन रहा।
• 1972 में एक बार फिर विधानसभा चुनाव हुए।
1969 का चुनाव बिहार में राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक बन गया। जोड़-तोड़ और सत्ता के खेल ने यहां स्थायी सरकार बनने नहीं दी। पांच साल में छह मुख्यमंत्री और दो बार राष्ट्रपति शासन से यह साफ हो गया कि बिहार की राजनीति में दल-बदल और गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो चुका था, जो आने वाले दशकों तक जारी रहने वाला था।






















